बाराबाटी किले के खँडहर
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ प्राचीनतम  व आधुनिकता  
     का उदाहरण है          
कटक
"कटक" उड़ीसा की प्राचीन राजधानी,जिसका इतिहास हजार वर्षों  से भी पुराना बताया जाता है.जो वर्तमान राजधानी "भुवनेश्वर "से लगभग 35 किलोमीटर दूर हावड़ा रेल मार्ग पर स्थित है. कटक में आप कों पुरानी एवम नई संस्कृति कों देखने का भी  मौका आज मिल जायेगा.जनवरी माह का अंतिम सप्ताह ,कटक के थियेटर मूवमेंट द्वारा आयोजित पंद्रह दिवसीय नाट्य एवम नृत्य समारोह के आमंत्रण पर में सिकंदराबाद से विशाखा एक्सप्रेस से परिवार सहित भुनेश्वर पहुंचे ,अठारह घंटे की सफ़र ने थका दिया था.कटक रेलवे स्टेसन के पास के एक होटल में हम लोंगों ने डेरा डाला.विश्राम करने के बाद कार्क्रम में भाग लिया.दूसरे दिन सुबह उठ कर कटक घुमने का प्रोग्राम बना,सबसे पहले पहुंचे बाराबाटी  स्टेडियम (जिसे अब नेताजी सुभाष चन्द्र स्टेडियम के नाम से जाना जाता है).उस दिन वहाँ पर 26 जनवरी के समारोह की तैयारी चल रही थी.पॉँच एकड़ क्षेत्र में फैले इस विशाल अंतर राष्ट्रिय  स्टेडियम में तीस हजार लोग एक साथ बैठ कर क्रिकेट का मजा उठाते हैं.इसी स्टेडियम से सटे "बारबाटी" किले कों देखने हमलोग  पहुंचे.महानदीएवम कथ्जुरी नदी के मुहाने पर बसा कटक शहर कभी व्यापार,अर्थनीति एवम हस्तशिल्प कला का केंद्र हुआ करता था.कहते हैं कि करीब नौ शताबदियों तक कटक उड़ीसा कि राजधानी हुआ करती थी,लेकिन अंग्रेजों ने जब उड़ीसा पर अपना आधिपत्य किया तो वे कुछ दिनों के बाद भुवनेश्वर कों वहाँ कि राजधानी बना दी
.हालाँकि आज भी कटक उड़ीसा की व्यवसायिक राजधानी के रूप मे जानी जाती है.कटक के इतिहास पर नजर डालें तो केशरी राजवंश के समय बे सैनिक शिविर "कटक" जिसका शाब्दिक अर्थ होता है' किला',जिसमे उनके सैनिक  रहा करते थे के कारण ही इस शहर का नाम "कटक"पड़ा.बताते हैं की 11 वीं सदी में केशरी राजवंश ने महा नदी पर एक विशाल बांध बनवाया ,जिस पर 14 वीं शताब्दी में "बाराबाटी" किले का निर्माण हुआ.बताते हैं कि महानदी के किनारे बना यह किला नौ मंजिला हुआ करता था,जिसके खूबसूरती से तराशे गए दरवाजें लोंगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे.18 वीं सदी में मराठों ने कटक पर अपना राज्य स्थापित कर लिया,इस दौरान उन्हों ने  कटक में कई आकर्षक मंदिरों का भी निर्माण भी करवाया.लेकिन बंगाल कि खड़ी में उठने वाले चक्रवात (तूफान) के थपेड़े यहाँ अक्कसर तबाही मचाते थे.जिसके चलते वे अमूल्य धरोहर काल के गाल में समां गए."बाराबाटी" किले के बारे में बताते हैं कि 12 वीं शताब्दी के पूर्व गंग राज्य के समय बनवाया गया था,जिस पर सन 1560 -1568 के बीच रजा मुकुंद देव ने किले के परिसर में अतरिक्त निर्माण करवा कर विशाल किले का रूप दिया.1568 से 1603 तक यह किला अफगानियों,मुगलों एवम मराठा राजाओं के अधीन था.सन 1803 में अंग्रेजों ने इस किले कों मराठों से छीन लिया.बाद में वे भुवनेश्वर चले गए ओउर यह किला उपेक्षित पड़ा रहा.जिसके खँडहर आज इस बात कि गवाही देते हैं कि कभी यह ईमारत बुलंद रही होगी.इसी शहर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जन्म लिया ,जिनका घर आज स्मारक के रूप में पर्यटकों के लिये खुला रहता है.  कहतें हैं कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देवजी जगन्नाथपुरी जाते समय कुछ समय के लिये यहाँ पर रुके थे. उन्होंने जो दातून कर के वहाँ फेंकी थी ,उससे वहाँ पर एक पेड़ लग गया था ,ज आज भी है.उसी जगह गुरुद्वारा बनवाया गया था जिसे आज "गुरुद्वारा दातून साहेब "के नाम से जाना जाता है.इस गुरूद्वारे कों" कालियाबोड़ागुरुद्वारा के नाम से भी पुकारते हैं.

कटक की कुल आबादी 5 .35 लाख है,जिसमे स्त्री व पुरुष का अनुपात 48 :52 तथा साक्षरता 77 प्रतिशत है.कटक कों यदि मंदिरों का शहर कहा  जाय तो कों अतिश्योक्ति नहीं होगी.जिनमे मुख्य मंदिर हैं परमहंस नाथ मंदिर, चंडी मंदिर,भट्टारिका मंदिर धबालेश्वर मंदिर,पॉँचमुखी हनुमान मंदिर आदि. इसके अलावा अन्य दर्शनीय स्थलों में प्रमुख हैं कदम-ऐ -रसूल ,जुमन मस्जिद ,साली पुर का संग्राहलय एवम नदी के किनारे बनी पत्थर की दीवार.इसके अलावा जब आप कटक जाएँ तो वहाँ पर स्थित चावल अनुसन्धान संसथान कों देखना न भूलें,यह एशिया का एकमात्र केंद्रहै.
                                       नेताजी सुभाष चाँद स्टेडियम
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अगर आप कटक जाने का कार्यक्रम बना रहें हैं तो पैकेज के लिये मैथली ट्रावेल्स
से इस नम्बर 09848472190 पर श्री अर्जुन सेठिया से संपर्क करें  .
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