फ़ैज़ाबाद की टाट वाली मस्जिद और हमीद चचा - प्रणाम पर्यटन - पहले पढ़ें, फिर घूमें

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बुधवार, 25 मार्च 2020

फ़ैज़ाबाद की टाट वाली मस्जिद और हमीद चचा

                            उत्तम सिंह (लखनऊ)
फ़ैज़ाबाद के चौक स्थित मस्जिद 
बात पुरानी है यानि 1978 की जब मैं फ़ैज़ाबाद में इतिहास एवं पुरातत्व में एम.ए. कर रहा था. हमारे कॉलेज के रास्ते में 'बड़ी बुआ का बाग' नामक एक जगह थी जिसके पीछे एक बड़ा क़ब्रिस्तान था. उन्हीं दिनों लखनऊ में किसी दर्ज़ी के पास एक ताम्रपत्र पाया गया था जिसके अनुसार इस क़ब्रिस्तान में नवाब शुजाउद्दौला के वक्त का एक बड़ा ख़ज़ाना दफ़न था. पुरातत्व विभाग की ओर से इस जगह पर उत्खनन के लिये प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रोफ़ेसर बी.बी लाल को  नियुक्त किया गया था. कॉलेज में हम लोगों से कहा गया कि हम उस उत्खनन की साइट पर जाकर एक रिपोर्ट बना कर कॉलेज में जमा करें. लिहाज़ा हम कुछ दोस्त वहां पहुंच गये. पुलिस का सख़्त पहरा था और खुदाई वाले स्थान के चारों ओर रस्सियों से घेर दिया गया था ताकि वहां बिलकुल सिरे तक कोई न जा सके. हम लोग प्रोफ़ेसर लाल साहब से मिले जिन्होंने हम लोगों को उस स्थान के बारे में और उत्खनन की प्रक्रिया के बारे में कुछ बातें बतायीं. उनके करीब ही भूरे रंग का कुर्ता और सफ़ेद पाजामा पहने, टोपी लगाये एक मुस्लिम बुज़ुर्ग खड़े थे जो शक्ल से ही एकदम सीधे सादे बल्कि कहें तो दीन हीन से लग रहे थे. प्रोफ़ेसर लाल ने उनका परिचय देते हुए हमको बताया कि ये 'हामिद साहब' हैं और भारत में हुए सभी प्रमुख उत्खनन की टीमों के सदस्य रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा तक की खुदाइयों में सहयोग दिया है और वे 'पुरातत्व के एनसाइक्लोपीडिया' हैं. हम लोगों ने उनसे सम्मान पूर्वक बातें करना शुरु किया और वे हमें बहुत उपयोगी बातें बताते रहे. उनका अद्भुत ज्ञान हमें चकित कर रहा था और वे धाराप्रवाह बोल रहे थे. बातचीत के दौरान मेरे एक सहपाठी ने कहा, "व्हीलर ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है......" . हामिद साहब इतना सुनते ही तन कर खड़े हो गये और बोले, "जनाब, 'सर मार्टीमर व्हीलर' कहिये, ज़रा अदब से नाम लीजिये उनका." हमारे सहपाठी ने फ़ौरन क्षमा मांगी. हम लोग वहां से लौट आये और अपनी अपनी रिपोर्ट अपने कॉलेज के प्रोफ़ेसर साहब को सौंप दी.
लगभग तीन साल गुज़र गये. मैं फ़ैज़ाबाद सिविल कोर्ट में नौकरी करने लगा था. एक शाम मैं फ़ैज़ाबाद चौक में टाटशाह मस्जिद के पीछे स्थित एक लाइब्रेरी से किताबें लेने पैदल ही जा रहा था. जाड़ों की शाम थी, धुंधलका फैल चुका था. एकाएक उस गली में मुझे वही हामिद साहब दिख गये. पहले से भी ज़्यादा दीन हीन और झुके हुए से. मैंने उन्हें देख कर सलाम किया. उन्होंने तो मुझे पहचाना नहीं होगा लेकिन सलाम का जवाब ज़रूर दिया.
लेखक उत्तम सिंह 
          इसके बाद का वाकया ऐसा है जो याद कर के मैं आज भी दुखी हो जाता हूं. सलाम का जवाब देने के बाद हामिद साहब ने कहा, "बेटा, आप मुझे एक चवन्नी दे सकते हैं क्या ? मेरी बीड़ियां ख़त्म हो गयी हैं और पैसे नहीं है." मेरा दिल दर्द से भर उठा. जिस आदमी को प्रोफ़ेसर लाल ने 'पुरातत्व का एनसाइक्लोपीडिया' कहा, जिस आदमी ने सर मार्टीमर व्हीलर जैसे पुरातत्ववेत्ता को असिस्ट किया, जिस आदमी ने हम को पुरातत्व के बारे में आधे घन्टे में वह जानकारी दे दी जो दो साल के एम.ए. में हमको नहीं मिली, आज वह आदमी मुझ जैसे अदना से इन्सान से चवन्नी मांग रहा था. मैंने उन्हें एक रुपये का नोट दिया तो वो बोले, " बेटा मेरे पास वापस करने के लिये बारह आने होते तो मैं आपसे क्यों मांगता?" मैंने उनसे कहा, "सर, आप मुझे कुछ वापस मत कीजिये. आप का दिया ज्ञान आज तक मेरे दिमाग़ में है." हामिद साहब ने अपना कांपता हुआ हाथ मेरे कन्धे पर रखा और बोले, "बेटे, अल्लाह आप को बहुत बरकत दे." इस घटना के बाद मैं उन्हें अक्सर खोजता रहा लेकिन वे मुझे दोबारा कभी नहीं मिले. उस इलाके में कोई उन्हें ढंग से जानता ही नहीं था शायद उनका घर कहीं और रहा हो. अब तो उनको गुज़रे   हुए भी एक ज़माना हो गया होगा लेकिन जब भी मैं उन्हें याद करता हूं तो मेरे सामने दो तस्वीरें आ जाती हैं. पहली, बड़ी बुआ के बाग़ में हम छात्रों के सामने धाराप्रवाह ज्ञान बांटते हुए हामिद साहब और दूसरी, दीन हीन होकर एक चवन्नी मांगते हुए हामिद साहब. पता नहीं, हम लोग अपनी विरासत का, अपनी विभूतियों का आदर करना कभी सीखेंगे या नहीं.

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