बापू की अंतिम विरासत - प्रणाम पर्यटन - पहले पढ़ें, फिर घूमें

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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

बापू की अंतिम विरासत

कुसुम ताई जोशी उर्फ पांडे


डॉ प्रदीप श्रीवास्तव

  एक साहित्यिक समारोह में भाग लेने वर्धा स्थित सेवाग्राम आया हूँ। बीते बीस सालों से लखनऊ - हैदराबाद के बीच रेल यात्रा कर रहा था । आते जाते वक्त ट्रेन वर्धा या सेवाग्राम में जरूर रुकती। जब कभी सुबह नींद खुलती तो एक बार इधर से गुजरते हुए बापू की इस पावन भूमि को नमन जरूर कर लेता,पर कभी सोचा नहीं था कि बापू की इस कर्मभूमि के 'रज' को स्पर्श करने का मौका भी मिलेगा। अचानक एक दिन विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ से एक पत्र मिलता है कि मेरे नाम का चयन विद्यापीठ ने एक सम्मान के लिए किया है। कार्यक्रम बापू की कर्मभूमि सेवाग्राम स्थित बापू कुटी में होना है। ऊहापोह के बीच जाने का मन बना ही लेता हूँ । वह भी इस लिए कि इसी बहाने बापू के उस पवन भूमि के रज को छूने का मौका मिल जाएगा ,जहां बापू ने ग्यारह साल बिताए थे। जिसके कण-कण में आज भी बापू बसते हैं।

ग्यारह अक्तूबर को सेवाग्राम के लिए निकलता हूँ ,ट्रेन काफी लेट हो चुकी है ,जिसे सुबह पाँच बजे पहुंचनी थी , वह दोपहर दो बजे पहुचने वाली है । सेवाग्राम स्टेशन उतरना है, आयोजकों ने पहले ही बता रखा था। । गाड़ी नागपुर से निकल चुकी है । बस कुछ देर में पहुँच भी जाऊंगा ,यही सोचते-सोचते चर्चिल की वह बात याद आती है, जिन्हों ने बापू को 'नंगा फकीर ' की संज्ञा दी थी। वहीं अल्बर्ट आईस्टाइन ने तो बापू के बारे में यहाँ तक कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ मुश्किल से इस बात पर विश्वास करेंगी कि "रक्त-मांस का बना ऐसा व्यक्ति कभी इस धरती पर चल फिर रहा था।"

उज्जवल भारत के लिए बापू का भी तो एक सपना था कि "मेरी कल्पना रामराज्य की है ,यानी धरती पर ईश्वरीय साम्राज्य की। मैं नहीं जनता कि स्वर्ग में इसका क्या स्वरूप होगा । आगे इसका नज़ारा क्या होगा ,इसे जानने की मेरी इच्छा नहीं है ,लेकिन यदि वर्तमान पर्याप्त आकर्षक है, तो भविष्य भी कुछ बहुत भिन्न नहीं हो सकता । मतलब ,ठोस शब्दों में स्वतन्त्रता तीन तरह की होनी चाहिए,राजनीतिक,आर्थिक और नैतिक ।" अचानक ट्रेन की गति कम होती है ,पता चलता है कि वर्धा निकाल चुका है । बस सेवाग्राम स्टेशन आने ही वाला है । दोनों स्टेशनों के बीच दूरी बमुश्किल पाँच से छह किलोमीटर की होगी। सामान समेट कर उतरता हूँ और स्टेशन से बाहर निकलता हूँ । आटो वाले से बात करता हूँ बापू कुटी चलने के लिए।वह तैयार हो जाता हैं।कुटी पहुचने पर विद्यापीठ के प्रतिकुलपति (महाराष्ट्र शाखा) संभाजी राव बावसकर मेरी प्रतीक्षा कर रहे होते है। साथ ही बापू आश्रम में काफी तादाद में साहित्यकारों व पत्रकारों का दल दिखाई देता है । पता चलता है कोई दक्षिण से तो कोई पंजाब से ,कोई बिहार से तो कोई नेपाल से आया है। सभी का एक-दूसरे से औपचारिक परिचय होता है।

कार्यक्रम अगले दिन सुबह से है तो सोचता हूँ कि नहा-धोकर फ्रेश हो जाऊँ ,फिर आश्रम के पास की जगह देखी जाए। जब तक कमरे से फ्रेश होकर बाहर निकलता हूँ तो सूर्य भगवान तेजी से विश्राम के लिए पश्चिम दिशा की ओर भागे जा रहे हैं। गोधुलि  की बेला आ गई । आश्रम के गेट पर नांदेड़ के कवि जय प्रकाश नागला , कोलकाता के वरिष्ठ साहित्यकार मार्तंड जी पत्नी मधु सहित एवं भागलपुर के वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कुंज, रांची की वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री सत्या शर्मा एवं नन्दा पांडे से भेंट होती है। बाहर से आने वालों का सिलसिला निरंतर जारी है ।

दूसरे दिन कार्यकर्मों में सहभागिता । देर रात तक व्यस्तता । आश्रम के ही एक कर्मचारी बताते है कि सामने ही बापू कुटी ,जहां  महात्मा गांधी जी ने अपने ग्यारह साल बिताए। सुबह पाँच बजे प्रार्थना होती है ,उसमे जरूर भाग लें । लेकिन रात में देर से सोने की वजह से नींद सात बजे खुलती है। कार्यक्रम ग्यारह बजे से होने वाला है, इस लिए बापू कुटी के लिए निकाल पड़ता हूँ , परिसर में ही पारस जी एक वृद्ध महिला से बात करते हुए  मिल जाते हैं । मुझे देखते ही उनसे परिचय कराते हें कि 'आप कुसुम ताई जोशी जी हैं जो चौदह वर्ष की उम्र से इसी आश्रम में रह रहीं हैं , जिन्हों ने बापू को बहुत नजदीक से देखा है। मेरी जिज्ञासा महात्मा गांधी जी के बारे में और जानने की प्रबल हो जाती है । 1936 में परिसर में ही  बापू ने एक पौधा लगाया था ,जिसने आज विशाल रूप ले लिया है। में ताई से वहीं पर बैठ कर बात करने का आग्रह करता हूँ,सीधे सरल स्वभाव वाली खादी की धोती में कुसुम ताई चल देती हैं।

  बापू द्वारा रोपे उसी विशाल पीपल के वृक्ष की छाँव में हम बैठ गए । फिर शुरू हुआ कुसुम ताई जोशी उर्फ पांडे जी के साथ बातों का सिलसिला। लगभग नब्बे वर्षीय कुसुम ताई बहुत ही मध्यम स्वर में बताने लगी कि जब वह चौदह वर्ष की थीं तो शिक्षा के लिए आश्रम में स्थित महात्मा गांधी द्वारा स्थापित नई तालीम विद्यालय में पढ़ने आई थी। माता-पिता भी गांधी अनुयाई थे सो उन्होने भी यही तालीम पाई । वे बताती हें कि 1931 में उनका जन्म यहीं वर्धा के गारगिल गाँव में हुआ था। पिता जी मूलतः छत्तीसगढ़ के थे ,रिटायर होने के बाद गांधी जी से प्रभावित होकर यहीं आ कर बस गए। पति शंकर राव पांडे भी यहीं के थे  ,26 साल पहले 1994 में उनका निधन हो गया । वे भी स्वतन्त्रता सेनानी थे सन 42 के आंदोलन में जेल भी गए।बताते –बताते भावुक हो जाती हैं। बेटी है वह विदेश में अपने परिवार के साथ रह रही है । मिलने दो-चार साल में आ जाती है।

वे आगे कहती हें कि 1945 में जब मैं चौदह साल की थी तो यहाँ आ गई । गांधी जी का शिक्षा पर काफी ज़ोर था, विशेष कर लड़कियों की शिक्षा पर। इसी उद्देश्य से नई तालीम की स्थापना की थी। उन्होने गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर से कहा था कि यहाँ के लिए कोई अच्छा गुरु भेजिये। जिस पर रवीन्द्र नाथ टैगोर जी ने कलकत्ता के शिक्षाविद पी.डब्लू.आर.एन.आई.की पत्नी आशा देवी जी को यहाँ भेजा। जो उस समय बनारस हिन्दू विश्व विध्यालय में पढ़ा रही थी,जो संस्कृत की प्रकाण्ड विद्वान थीं ।उन्होने ने यहाँ पर बालवाड़ी की स्थापना की। यहीं पर मेरी पढ़ाई हुई और बाद में शिक्षिका हो गई । पति भी यहीं कार्यकर्ता थे। पी.डब्लू.आर.एन.आई मूलतः श्रीलंका के सिलोन के रहने वाले थे। बाद में उनकी वहीं मृत्यु हो गई। वे बताती हैं की भारत छोड़ो आंदोलन की रूपरेखा यहीं बनी तथा प्रस्ताव भी यहीं पास हुआ था । बापू अक्सर स्कूल में आते थे,सारा कुछ स्वयम देखते थे। तब मैं छोटी थी।

यह पूछने पर कि आप गांधी जी से व्यक्तिगत मिलीं क्या ? या उनका कोई संस्मरण हो वह बताइये? इस पर ताई ने कहा कि व्यक्तिगत की बात ही नहीं थी, हम हास्टल में रहते थे ,बापू इस कुटी में। हाँ अक्सर वह हास्टल निरीक्षण करने आते थे ,तब वो अध्यापिकाओं व बच्चों से मिलते और जानकारी प्राप्त करते थे,जिस पर तुरंत अमल भी होता था। वे आगे एक घटना का जिक्र करती हैं। लड़कों के छात्रावास के इंचार्ज मेरे पति थे ,उसका निरीक्षण करने एक बार बापू अचानक वहाँ पहुंचे। वहाँ छात्रों के रहन सहन की जानकारी ले रहे थे ,अचानक उन्होने अपने छड़ी से एक छात्र के अलमारी को देखा जो ,गंदा था ,बस तुरंत पति से कहा कि यह क्या है ? तुरंत इसकी सफाई करवाइए। वे आगे कहतीं हें कि मेरे घर भी बापू आते थे ,तब हम बहुत छोटे थे ,ठीक से याद नहीं ।

यह पूछने पर कि मृत्यु के एक दिन बाद वह यहाँ आने वाले थे , लेकिन उस घटना के बाद यहाँ का माहौल कैसा था ? कुसुम ताई बताती हैं कि 31 जनवरी को उन्हें आना था, कुटी व परिसर की साफ-सफाई कर दी गई थी। वह उसी पीपल के पेड़ (जिसे बापू ने लगाया था) को ऊपर देखने लगीं, चिड़ियों की चहचहाहट जारी थी, कहने लगी कि 30 जनवरी की शाम का समय था ,गोधुली की बेला थी,आश्रम के सभी लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। तभी बापू की कुटी में लगी फोन (हाट लाईन) की बड़ी (लंबी)  घंटी बजने लगी। आश्रम के प्रभारी भागे-भागे कुटी में गए और फोन का चोंगा उठाया ,अचानक क्षण भर में उनका चेहरा उतर गया ,लोगों को किसी बड़े आशंका की शंका हो गई थी। देखते-देखते पूरा आश्रम गमगीन माहौल में डूब गया। सभी लोग हतप्रभ थे। इसी बापू कुटी के सामने प्रार्थना सभा आयोजित की गई । इसी कुटी में बापू का अस्थि कलश भी रखा गया,जिसे बाद में पवनार स्थित धामनदी में प्रवाहित किया गया ।

वे गमगीन हो जाती हैं, गंभीर स्वर में कहने लगती हैं ,जिस शाम उनकी हत्या हुई थी उसी रात बापू को सेवाग्राम आन था ,लेकिन .... उसके बाद वह चुप हो जाती हैं । थोड़ा रुक कर के वह कहने लगती हें कि बापू को मारा जरूर नाथू  राम गोडसे ने था, लेकिन मरवाया था सावरकर ने । उन्होने ने ही यह ज़िम्मेदारी नाथू  राम गोडसे को दी थी। 29 जनवरी को प्रार्थना सभा में भारी भीड़ को देखकर गोडसे अपने मिशन में सफल नहीं हुए। रात में वह सावरकर के पास पहुंचे और अपने मिशन में सफल न होने की दास्तां उन्हें सुनाई। गोडसे ने फिर भी उन्हें आश्वासन दिया कि कल जरूर हो जाएगा। इस पर सावरकर ने गोडसे को “यशस्वी भव “ आशीर्वाद भी दिया था। दूसरे दिन गोडसे ने अपने मिशन के तहत प्रार्थना सभा में जाते समय बापूको गोली मर दी थी । जिन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया था। वे आगे बताती हें कि बापू की हत्या के बाद लार्ड माउंट बेटेन ने अंतिम संस्कार के समय दुख प्रकट करते हुए कहा था कि “एक हिन्दू ने दूसरे हिन्दू को मार दिया”, कितना दुर्भाग्य है कि इस देश के लोग अपने नेता को भी पहचान नहीं सके”।

ताई से यह पूछे जाने पर कि बापू से संघ को चिढ़ किस बात की थी ? पता नहीं , अब तो उन्ही का राज है । गांधी जी तो सदैव हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, सभी को एक साथ लेकर चलते थे। लेकिन मारा क्यूँ ,यह बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई ।         

यह पूछे जाने पर कि गांधी के भारतऔर वर्तमान भारत में आप क्या अंतर पाती हैं ? इस प्रश्न पर ताई हँसते हुए कहती हैं कि आप सभी को पता है , मैं क्या कहूँ ? अब तो संघ वालों का राज है, जिनकी कभी भी बापू पर श्रद्धा नहीं थी। आप ही देखिये न हाल ही में संघ की एक बहन ने बापू की फोटो पर गोली मार  दी। यही नहीं उसके पति ने फोटो को जला दिया। सोचिए इससे क्या मिलने वाला है, अब तो बापू को इस दुनिया से गए हुए कितने साल हो गए हैं,फिर इससे क्या मिलेगा।

अच्छा ताई ,वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी प्रधान मंत्री बनने के बाद इस आश्रम में आए क्या? हाँ एक बार आए थे ,वर्धा में कोई कार्यक्रम था। वहीं से आए थे ,सीधे बापू कुटी गए,दर्शन किए और वापस चले गए। किसी से मिले नहीं। शायद समय नहीं था।

वर्तमान सरकार के कामों को आप किस तरह देखती हैं ? इस प्रश्न पर कुसुम ताई संजीदा हो कर कहने लगती हैं ,कर रहे हैं ,अच्छा कर रहे हैं आखिर देश तो उनका भी है । मोदी जी एक अच्छे प्रधान मंत्री लगते हैं।

चलते-चलते मैं ताई से पूछता हूँ कि परिसर में एवं बापू कुटी में अंधेरा सा रहता है, एक छोटा सा बल्ब तो लगना चाहिए ? इस पर ताई कहने लगती हैं कि देश के अंतिम घर में जब तक बिजली नहीं आएगी , उस दिन तक बल्ब की रोशनी का उपयोग नहीं करूंगा। वे हमेशा कंदील का उपयोग करते थे,इसी लिए इस आश्रम को 1946 से आज तक ज्यों का त्यों रखा गया है । उन्होने ने आगे कहा कि हम बापू की स्मृति से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं करना चाहते।

90 वर्षीय कुसुम ताई पांडे उर्फ जोशी,जिन्हों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ आश्रम में इतना लंबा समय  गुजारा या यूं कहें कि बापू की विरासत की अंतिम कड़ी को प्रणाम किया और उनसे विदा ली।

 (फोटो सौजन्य: रांची से सुश्री सत्या शर्मा एवं नंदा पांडे)

         

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