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सोमवार, 9 मई 2022

चलें , हिमालय के चार धाम

 

गंगोत्री 

प्रदीप श्रीवास्तव

गंगोत्री धाम       

हिमालय के चार धाम को कुछ समय पहले तक छोटा चार धाम के नाम से जाना जाता था ,जिसे अब बदल कर हिमालय के चार धाम कर दिया गया है,क्यों की ये चार धाम हिमालय की गोद में ही स्थित हैं.सभी उत्तराखंड में ही हैं.इस लिए  उत्तराखंड के चार धाम को छोटा चार धाम, हिमालय के चार धाम के नाम से जानते हैं। उत्तराखंड के चार धाम में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ शामिल हैं।

      पौराणिक गाथाओं व हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करने मात्र से मनुष्य के इस जन्म के पाप धुल जाते है, वरन जन्म मृत्यु के बंधन से भी मुक्ति मिल जाती है। यह भी माना जाता है, की इन स्थानों पर पृथ्वी एवं स्वर्ग एक हो जाते है. यात्रा के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग क्या है ?आम तौर पर, चार धाम यात्रा पश्चिम से पूर्व में की जाती है, यह, यह दर्शाता है कि यात्रा यमुनोत्री से शुरू होती है, और गंगोत्री से गुजरते हुए, केदारनाथ और अंत में बद्रीनाथ धाम पर समाप्त होती है।

     यह पवित्र यात्रा अप्रैल-मई के महीने से शुरू होती है और वह प्रत्येक वर्ष दिवाली (अक्टूबर-नवंबर) तक खुली रहती है। चरम जलवायु के कारण सर्दियों के मौसम के दौरान यात्रा बंद रहती है। यात्रा के लिए शिखर का समय मई-जून और सितंबर-अक्टूबर का है। जुलाई और अगस्त के महीनों में यात्रा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस समय गढ़वाल क्षेत्र मैं भारी वर्षा से कई समस्याओं का सामना हो सकता है। इन महीनों के दौरान भूस्खलन और भारी वर्षा का खतरा बड़ी संख्या में है। यात्रा के लिए सितंबर का महीना आदर्श माना जाता है क्योंकि बारिश के बाद, इस क्षेत्र की सुंदरता विस्मयकारी विचारों और सफेद परिदृश्य के साथ-साथ बढ़ जाती है। पूरे क्षेत्र की सुंदरता तीर्थयात्रियों पर जादू का करती है, क्योंकि वहां लुभावनी सुंदर दृश्यों देखने को मिलते हैं।

      शिवलिंग चोटी के आधार स्थल पर गंगा पृथ्वी पर उतरी जहां से उसने 2,480 किलोमीटर गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक की यात्रा शुरू की। इस विशाल नदी के उद्गम स्थल पर इस नदी का नाम भागीरथी है जो उस महान तपस्वी भागीरथ के नाम पर है जिन के आग्रह पर गंगा स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर आयी। देवप्रयाग में अलकनंदा व भागीरथी नदी के संगम के पश्चात बनी इस नदी का नाम गंगा हो जाता है

      प्राचीन काल में गंगोत्री धाम में कोई मंदिर नहीं था। यहाँ भागीरथी शिला के निकट एक मंच था, जहां साल के तीन-चार महीनों के लिये देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी जाती थी और इन मूर्तियों को गांवों के विभिन्न मंदिरों जैसे श्याम प्रयाग, गंगा प्रयाग, धराली तथा मुखबा आदि गावों से लाया जाता था। तथा बाद में फिर उन्हीं गांवों में लौटा दिया जाता था   लेकिन 18वीं सदी में गढ़वाल के गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने गंगोत्री मंदिर का निर्माण करवाया। ये भी माना जाता है कि जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने 20वीं सदी में इस मंदिर की मरम्मत करवाई । प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर के महीने के बीच गंगा मैया के दर्शन करने के लिए लाखों श्रद्धालु तीर्थयात्री यहां आते है। गंगोत्री का पतित पावन मंदिर शीतकाल में पूर्ण रूप से हिमाछादित रहता है। इस लिए अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) के पावन पर्व पर मंदिर के कपाट खुलते है और दीपावली (अक्टूबर-नवंबर) के दिन कपाट बंद हो जाते है।

पौराणिक मान्यता

कहा जाता है की, पृथ्वी पर गंगा का अवतरण राजा भागीरथ के कठिन तप से हुआ, कहा जाता है कि जब राजा सगर ने अपना 100वां अश्वमेध यज्ञ किया तो इंद्रदेव ने अपना राज्य छिन जाने के भय से भयभीत होकर उस घोड़े को ऋषि कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के 60,000 पुत्रों ने घोड़े की खोज करते हुए तप में लीन कपिल मुनि को परेशान एवं अपमानित किया। कपिल मुनि के क्रोधित होने पर उन्होंने अपने आग्नेय दृष्टि से तत्क्षण सभी को जलाकर भस्म कर दिया। क्षमा याचना किये जाने पर मुनि ने बताया कि राजा सगर के पुत्रों की आत्मा को तभी मुक्ति मिलेगी जब गंगाजल उनका स्पर्श करेगा। सगर के कई वंशजों द्वारा आराधना करने पर भी गंगा ने अवतरित होना अस्वीकार कर दिया। अंत में राजा सगर के वंशज राजा भागीरथ ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये 5500 वर्षों तक घोर तप किया। उनकी भक्ति से खुश होकर देवी गंगा ने पृथ्वी पर आकर उनके शापित पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति देना स्वीकार कर लिया। देवी गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के वेग से भारी विनाश की संभावना थी और इसलिये भगवान शिव को राजी किया गया कि वे गंगा को अपनी जटाओं में बांध लें। भागीरथ ने तब गंगा को उस जगह जाने का रास्ता बताया जहां उनके पूर्वजों की राख पड़ी थी और इस प्रकार उनकी आत्मा को मुक्ति मिली। माना जाता है कि महाकाव्य महाभारत के नायक पांडवों ने कुरुक्षेत्र में अपने सगे संबंधियों की मृत्यु पर प्रायश्चित करने के लिये देव यज्ञ गंगोत्री में ही किया था।

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संक्षेप में : स्थान –उत्तरकाशी , समुद्र तल से ऊँचाई - 3042 मीटर , स्थापना - गोरखाओं के सेनापति अमरसिंह थापा |द्वारा 18वीं शताब्दी में, पुनरुद्धार , जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने , कपाट खुलते है -अक्षय तृतीया के दिन , कपाट बंद होते - दीपावली के दिन

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यमुनोत्री धाम 

       यमुनोत्री का वास्तविक स्रोत बर्फ की जमी हुई एक झील और हिमनद है, जो समुद्र तल से 4421 मीटर की ऊँचाई पर कालिंद पर्वत पर स्थित है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार यह असित मुनि का निवास था। वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। जो भूकंप से विध्वंस हो चुका था, जिसका पुनर्निर्माण कराया गया।

मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है, जिसे दिव्य शिला के नाम से जाना जाता है। यमुनोत्री मंदिर परिसर 3235 मी. ऊंचाई पर स्थित है। यँहा भी मई से अक्टूबर तक लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है। शीतकाल में यह स्थान पूर्ण रूप से हिमाछादित रहता है। इस लिए अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) के पावन पर्व पर मंदिर के कपाट खुलते है और दीपावली (अक्टूबर नवंबर) के दिन कपाट बंद हो जाते है।

इस मंदिर के आस-पास जल के कई सोते है जो अनेक कुंडों में गिरते है इन कुंडों में सबसे प्रसिद्ध कुंड सूर्य कुंड है। यह कुंड अपने उच्चतम तापमान 80 डिग्री सेल्सियस के लिए विख्यात है। भक्तगण देवी को प्रसाद के रूप में चढ़ाने के लिए कपडे की पोटली में चावल और आलू बांधकर इसी कुंड के गर्म जल में पकाते है। देवी को प्रसाद चढ़ाने के पश्चात इन्ही पकाये हुए चावलों को प्रसाद के रूप में भक्त जन अपने अपने घर ले जाते हैं। सूर्य कुंड के निकट ही एक शिला है जिसे दिव्य शिला कहते हैं। इस शिला को दिव्य ज्योति शिला भी कहते हैं। भक्तगण, भगवती यमुना की पूजा करने से पहले इस शिला की पूजा करते हैं।

पौराणिक मान्यता

        यमुनोत्री के बारे में वेदों, उपनिषदों और विभिन्न पौराणिक व्याख्यानों में विस्तार से वर्णन किया गया है। पुराणों में यमुनोत्री के साथ असित ऋषि की कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है की वृद्धावस्था के कारण ऋषि कुंड में स्नान करने के लिए नहीं जा सके तो उनकी श्रद्धा देखकर यमुना उनकी कुटिया में ही प्रकट हो गई। इसी स्थान को यमुनोत्री कहा जाता है। कालिंद पर्वत से निकलने के कारण इसे कालिन्दी भी कहते हैं।

         एक अन्य कथा के अनुसार सूर्य की पत्नी छाया से यमुना व यमराज पैदा हुए यमुना नदी के रूप में पृथ्वी में बहने मे लगीं और यम को मृत्यु लोक मिला। कहा जाता है कि जो भी कोई माँ यमुना के जल में स्नान करता है वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होता है और मोक्ष को प्राप्त करता है। किंवदंती है कि यमुना ने अपने भाई से भाई दूज के अवसर पर वरदान मांगा कि इस दिन जो यमुना में स्नान करे उसे यमलोक न जाना पड़े, अतः इस दिन यमुना तट पर यम की पूजा करने का विधान भी है।            

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संक्षेप में : स्थान – उत्तरकाशी , समुद्र तल से ऊँचाई - 3235 मीटर , स्थापना - वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था ,कपाट खुलते हैं - अक्षय तृतीया के दिन , कपाट बंद होते हैं - दीपावली के दिन

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 केदारनाथ धाम 

         चार धामों में सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित धाम केदारनाथ है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। भारत के 4 धाम (पूर्व में जगन्नाथ, पश्चिम में द्वारका, उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम) की स्थापना करने के बाद शंकराचार्य जी ने इस मंदिर का निर्माण कराया था और इस मंदिर के पीछे शंकराचार्य जी की समाधि है। यह मंदिर कत्यूरी निर्माण शैली का है। शीतकाल में यह स्थान पूर्ण रूप से हिमाछादित रहता है, इसलिए शीतकाल में केदारनाथ की डोली को ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में रखा जाता है। यहां के पुजारी दक्षिण भारत के रावल होते है। यहां पर कुछ पवित्र कुण्ड है, जैसे गौरी कुण्ड, पार्वती कुण्ड, हंस कुण्ड आदि। भीमगुफा, ब्रह्म गुफा भी केदारनाथ में ही स्थित है। इस मंदिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल रहा है।

पौराणिक मान्यता

        हिमालय के केदार के चोटी पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए • और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक पहाड़ की चोटी पर स्थित है। पंच केदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने के बाद पांडव भ्रातृ-हत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। जिसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद लेना चाहते थे, लेकिन भगवान शंकर उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतर्ध्यान हो कर केदार चले गए। लेकिन पांडव उनका पीछा करते-करते केदार जा पहुंचे। यह बात भगवान शंकर को ज्ञात हो गई, की पांडव केदार आ चुके हैं तब उन्होंने बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हुआ की भगवान शिव पशु का रूप धारण कर चुके है। अतः भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर अपने पैर फैला दिए। अन्य सब गाय-बैल तो भीम के पैरों के बीच से निकल गए, परन्तु भगवान शंकर, जिन्होंने बैल का रूप धारण किया था वह पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की पीठ पकड़ ली। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति- पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमहेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

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संक्षेप में , स्थान – रुद्रप्रयाग , समुद्र तल से ऊँचाई - 3581 मीटर , स्थापना - आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा , कपाट खुलते है - कपाट बंद होते है -भाई दूज (यामा द्वितीय) के दिन।

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बद्रीनाथ धाम 

       बद्रीनाथ मंदिर, जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। यह चार धाम व पंच- बदरी में भी है। यह समुद्रतल से 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किमी. की दूरी पर स्थित बदरीनाथ शिखर की ऊंचाई 7,138 मीटर है। महाभारत और पुराणों में इसे बद्री वन, विशाला बद्री कात्रम के नाम से जाना जाता था। यह मंदिर नर व नारायण नामक दो पर्वतों के मध्य में स्थित है। शीतकाल में बद्रीनाथ महाराज की डोली जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में रखी जाती है। यहां के पुजारी दक्षिण भारत के रावल होते है।

पौराणिक मान्यताएं

         पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो वह 12 धाराओं में बंट गई। जिनमे से एक धारा इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई जिसे वर्तमान में अलकनंदा नदी के रूप में जाना जाता है। इस नदी के तट पर ही बद्रीनाथ धाम स्थित है, जो भगवान विष्णु का निवास स्थान माना जाता है। यह पंच बद्री में से एक है। माना जाता है, की बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण गढ़वाल के राजा द्वारा कराया गया था, जिसका पुनरुद्धार 8वीं शदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने किया।

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संक्षेप में : स्थान - अलकनंदा नदी के किनारे ,नर और नारायण पर्वतों के बीच , समुद्र तल से ऊँचाई - 3133 मीटर

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