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शनिवार, 17 सितंबर 2022

भारत की धरती पर लौटे चीते ,कूनो के जंगल में गूंजेंगी उनकी गुर्राहट


                                                             
प्रदीप श्रीवास्तव

लखनऊ|17 सितम्बर 2022 ,भारतीय वन्य जीव के इतिहास का स्वर्णिम दिन के रूप में अंकित एक दिन . लगभग 71 बाद मध्य प्रदेश के 748 वर्ग  किलो मीटर में फैले कूनो अभ्यारण्य में नामीबियाई चीतों की गुर्राहट एवं कुलाचें एक बार फिर से दिखाई देगी.कूनो अभ्यारण्य में निमिबियाई से आठ चीते लाये गए हैं , जिनमें पांच मादा एवं तीन  नर चीते हैं. फ़िलहाल एक माह तक इन सभी  चीतों को अभ्यारण्य क्षेत्र में 12 वर्ग किलोमीटर के बनायेगाये विशेष बाड़े(आवास) में आइसोलेशन यानी क्वारंटाइन रखा जाएगा। चीतों को यहां जानवरों का शिकार करना पड़ता है। भारत में पाया जाने वाला हिरण अफ्रीका में नहीं पाया जाता है. तो सवाल यह है कि क्या चीते इस जानवर का शिकार कर सकते हैं. इसके अवलोकन के बाद ही चीतों को अभयारण्य में छोड़ा जाएगा. यह भी देखना जरूरी है कि चीतों को भारत में पर्यावरण के अनुकूल होना पड़ता है . चीतों को 24 घंटे निगरानी में भी रखा जाएगा .

उल्लेखनीय  है कि शनिवार 17 सितम्बर 22 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने  कूनो अभ्यारण्य में आयोजित के कार्यक्रम में सभी आठों चीतों को बाड़े में छोड़ा.इस मौके पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ' हमारे यहां एशियाई शेरों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ है। इसी तरह, आज गुजरात देश में एशियाई शेरों का बड़ा क्षेत्र बनकर उभरा है. इसके पीछे दशकों की मेहनत, रिसर्च बेस पालिसी और जन-भागीदारी की बड़ी भूमिका है। आज देश में 75 वेटलैंड को रामसर साइट्स के रूप में घोषित किया गया है, जिनमें 26 साइट्स पिछले 4 वर्षों में ही जुड़ गई हैं . देश के इन प्रयासों का प्रभाव आने वाली सदियों तक दिखेगा, और प्रगति के नए पथ प्रशस्त करेगा . बाघ की संख्या को दोगुना करने का जो लक्ष्य तय किया गया था उसे समय से पहले हासिल किया है . असम में एक समय एक सींग वाले गैंडों का अस्तित्व खतरे में पड़ने लगा था, लेकिन आज उनकी भी संख्या में वृद्धि हुई है . हाथियों की संख्या भी पिछले वर्षों में बढ़कर 30 हजार से ज्यादा हो गई है . आज 21वीं सदी का भारत, पूरी दुनिया को संदेश दे रहा है कि इकोनॉमी और इकोलॉजी कोई विरोधाभाषी क्षेत्र नहीं है . पर्यावरण की रक्षा के साथ ही, देश की प्रगति भी हो सकती है, ये भारत ने दुनिया को करके दिखाया है . देश में सात दशक बाद आज से फिर चीता युग की शुरुआत हो गई है.'

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि 'कूनो नेशनल पार्क में जब चीता फिर से दौड़ेंगे, तो यहां का ग्रासलैंड इकोसिस्टम फिर से रिस्टोर होगा, बायोडायवर्सिटी और बढ़ेगी. अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन्स पर चलते हुए भारत इन चीतों को बसाने की पूरी कोशिश कर रहा है . हमें अपने प्रयासों को विफल नहीं होने देना है. कूनो नेशनल पार्क में छोड़े गए चीतों को देखने के लिए देशवासियों को कुछ महीने का धैर्य दिखाना होगा, इंतजार करना होगा . आज ये चीते मेहमान बनकर आए हैं, इस क्षेत्र से अनजान हैं. कूनो नेशनल पार्क को ये चीते अपना घर बना पाए, इसके लिए हमें इन चीतों को भी कुछ महीने का समय देना होगा. कूनो नेशनल पार्क में छोड़े गए चीतों को देखने के लिए देशवासियों को कुछ महीने का धैर्य दिखाना होगा, इंतजार करना होगा.आज ये चीते मेहमान बनकर आए हैं, इस क्षेत्र से अनजान हैं. कूनो नेशनल पार्क को ये चीते अपना घर बना पाएं, इसके लिए हमें इन चीतों को भी कुछ महीने का समय देना होगा. प्रकृति और पर्यावरण, पशु और पक्षी, भारत के लिए ये केवल सस्टेनेबिलिटी और सिक्युरिटी के विषय नहीं हैं. हमारे लिए ये हमारी सस्टेनबिलिटी और स्प्रीच्चुलिटी का भी आधार हैं .'

उन्होंने ने यह भी कहा कि ' कहा कि दशकों पहले, जैव-विविधता की सदियों पुरानी जो कड़ी टूट गई थी, विलुप्त हो गई थी, आज हमें उसे फिर से जोड़ने का मौका मिला है. आज भारत की धरती पर चीता लौट आए हैं. और मैं ये भी कहूंगा कि इन चीतों के साथ ही भारत की प्रकृति प्रेमी चेतना भी पूरी शक्ति से जागृत हो उठी है. मैं हमारे मित्र देश नामीबिया और वहां की सरकार का भी धन्यवाद करता हूं जिनके सहयोग से दशकों बाद चीते भारत की धरती पर वापस लौटे हैं. ये दुर्भाग्य रहा कि हमने 1952 में चीतों को देश से विलुप्त तो घोषित कर दिया, लेकिन उनके पुनर्वास के लिए दशकों तक कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ. आज आजादी के अमृत काल में अब देश नई ऊर्जा के साथ चीतों के पुनर्वास के लिए जुट गया है. ये बात सही है कि, जब प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण होता है तो हमारा भविष्य भी सुरक्षित होता है. विकास और समृद्धि के रास्ते भी खुलते हैं .' प्रधान मंत्री ने यह भी कहा कि ' गुजरात देश में एशियाई शेरों का बड़ा क्षेत्र बनकर उभरा है.

पता हो कि भारत ने  इन अफ्रीकी चीतों को एक्सपेरिमेंट के तौर पर स्वदेश लाये है. 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि अफ्रीकी चीतों को भारत लाकर उनके लिए जरूरी वातावरण देकर उन्हें बसाने का प्रयोग किया जा सकता है. तबसे केंद्र सरकार इसपर काम कर रही है.कभी भारत भी एशियाई चीतों का घर हुआ करता था, लेकिन 1952 तक उन्हें यहां से विलुप्त घोषित कर दिया गया. लुप्तप्राय होने की कगार पर यह चीता कभी मिडिल ईस्ट, सेंट्रल एशियाई देशों और भारत में काफी हुआ करता था. अब इनकी नाममात्र संख्या बस ईरान में रह गई है.

विदित हो कि 75 साल पहले वर्ष 1947 में देश में आखिरी बार चीता देखा गया था। छत्तीसगढ़ में कोरिया के महाराजा ने तीन चीता शावकों का एक साथ शिकार किया था। वर्ष 1952 में भारत सरकार ने चीतों को विलुप्त घोषित कर दिया था। इसके बाद आज देश में फिर से चीतों की वापसी हुई .जिसके साथ ही भारत ने आज एक इतिहास रच दिया.

यहाँ यह भी बताना समायोचित होगा कि ' मध्यप्रदेश को  पहले से टाइगर स्टेट, तेंदुआ स्टेट, वल्चर  स्टेट और घड़ियाल स्टेट  का दर्जा प्राप्त है और अब  इन आठ चीतों  के आने के बाद मध्यप्रदेश चीता  स्टेट भी बन गया है. एमपी में सबसे ज्यादा 526 बाघ,  3421 तेंदुए  हैं. इसके अलावा प्रदेश में जंगल 30 प्रतिशत से  अधिक है और राष्ट्रीय  उद्यान 10 हैं. टाइगर रिजर्व 6, वन्य  जीव अभयारण्य 25 हैं. घड़ियाल और वल्चर के मामले में भी यह प्रदेश सबसे आगे हैं.

शनिवार की सुबह ही इन चीतों को नामीबिया की राजधानी विंडहोक से एक चार्टर्ड बोईंग 747 से आठ हज़ार किलोमीटर की यात्रा ग्यारह घंटों में कराकर ,पहले ग्वालियर हवाई अड्डे फिर वहां से चीनूक हेलीकाप्टर से कूनो अभ्यारण पहुँचाया गया .जहाँ पर सुबह 10.45 बजे प्रधान मंत्री ने कूनो के जंगल मैं छोड़ा .

यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि ' 1952 में भारत में चीते विलुप्त हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में चीतों को भारत में आयात करने की अनुमति दी. भारत में चीतों के विलुप्त होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1970 में उन्हें देश में लाने के प्रयास शुरू किए गए थे. लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने इसकी इजाजत देने से इनकार कर दिया था. इसके बाद यह प्रोजेक्ट चीता 2022 में पूरा किया गया है. बताया जाता है कि इस प्रोजेक्ट चीता के लिए भारत सरकार ने करीब 90 से 92 करोड़ रुपए खर्च किए हैं .

(सभी चित्र गूगल व अन्य स्रोतों से आभार सहित.)


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