☘️ निशा चंद्रा, अहमदाबाद

सबसे पहले इस पुस्तक में मुझे किसी ने आकर्षित किया, वह था इसका नाम। जिसने अचानक मुझे अपने घर की उस देहरी पर ला खड़ा किया ,जहां एक छोटी सी लड़की गली में कुछ लड़कों को कंचे खेलते हुए देख रही है,मन ललचा रहा है कि जाये पर इजाजत नहीं है।लडकी उदास है।कंचे लड़के खेलते हैं,लड़कियां नहीं।और गली में तो बिल्कुल नहीं ।उस बच्ची ने एक उपाय खोज निकाला।बहुत सारे रंग- बिरंगे कंचे खरीद कर लाई और कांच की बोतल में भर दिये।अब वह बहुत खुश थी। रोज उन रंग बिरंगे कंचों को देखती और खुश होती। विवाह के बाद उसने सबसे पहला काम यह किया कि अपनी बेटियों को बहुत सारे कंचे लाकर दिये और कहा,

जितना मन करे खेलो। 

पर उन्हें कौड़ियां ज्यादा पसंद थी।

उपन्यास पढ़ते हुए मुझे लगा यह तो आज का उपन्यास नहीं है। लगा मैं डाॅ. धर्मवीर भारती जी का उपन्यास पढ़ रही हूँ 'गुनाहों का देवता ' एक एक पृष्ठ पढ़ते हुए मैंने अपने आपको युवावस्था की उसी सीढ़ी पर पाया जब मैं सुधा थी और काल्पनिक चंदर मेरे सपनों का राजकुमार। आज वही एहसास बलदेव के प्यार के साथ जीवित हो रहा है। 

काॅलेज का वार्षिकोत्सव था और उसमें विधायक गायत्री जी का मुख्य मेहमान की तरह आना। प्रोफेसर बलदेव ने काॅलेज को बहुत सुंदर तरीके से सजवाया था क्योंकि यह काॅलेज पहले गायत्री देवी के पुरखों की हवेली थी,जिसे उन्होंने काॅलेज बनाने के लिए सरकार को सौंप दिया था। आज इस संस्था में वार्षिक प्रदर्शनी का उद्घाटन भी है। प्रोफेसर बलदेव कुछ सोचते सोचते उस हाॅल में पहुंच गये जहां कलाकृतियां लगी हुई थीं। उन्होंने देखा वह उस पेन्टिंग के सामने खड़े हैं,जो उन्होंने ही बनाई थी। पारिजात का फूलों से लदा एक पेड़.. पेड़ से झरते अनगिनत फूल...उन झरते फूलों के नीचे दुपट्टा फैलाये खड़ी दो लड़कियां और पेड़ पर ,पेड़ को हिलाने की मुद्रा में उस पर खड़ा हुआ एक लड़का। झरते हुए फूल पेन्टिंग में सच में गिरते हुए प्रतीत हो रहे हैं। प्रोफेसर के मानस में स्मृतियों के चक्र बनने लगे हैं और उनके मुंह से एक नाम फुसफुसाहट बनकर निकल रहा है....

परी ...

यादें...यादें..यादें...

कभी हंसाती हैं तो कभी रुलाती हैं।उसमें भी बचपन की यादें तो जैसे जीने का सहारा बन जाती हैं।आज फिर परी याद आई है।पर वह भूले ही कब थे ,भूले होते तो आज पैंतीस साल के हो जाने के बाद भी उसकी दी हुई कौड़ियां अपनी जेब में लेकर ना घूम रहे होते।बचपन की स्मृतियों को उन्होेंने अपनी बनाई कलाकृतियों में कैद कर लिया है।पर वह उन्हें भूल गई, अपने बचपन के साथी को ।भूली ना होती तो गायत्री की आँखों में पहचान की एक चमक तो कौंधती। 

उपन्यास के केंद्र में काल और स्मृति के बीच का द्वंद्व है जो उपन्यास को गहरे तक मार्मिक बनाता है। नायक बचपन की साथी के द्वारा दी हुई कौड़ियों को आज तक प्यार से सहेजे हुए है।विवाह और बच्चे हो जाने के बाद भी आज तक बचपन, बचपन के खेल, परी के द्वारा दी गई कौड़ियां, कुछ भी तो नहीं भूले।कई बार बेटी पूछती,

'पापा आप यह कौड़ियां हमेशा अपनी जेब में क्यों रखते हो '

क्या कहे बलदेव। 

'यह मेरे लिए लकी चार्म हैं,इसलिए हमेशा अपने पास रखता हूं'।

क्या जैसे बलदेव ने कौडियां सहेज कर रखीं।क्या उसने भी कंचे रखे होंगे? यह रहस्य मैं रहने देती हूं।उपन्यास पढ़ने पर ही आप जान पाएंगे ना सिर्फ कंचे और कौडियों का रहस्य ,और भी बहुत कुछ। कुछ अनकही बातें जो बलदेव के मन में हमेशा स्वतः निरन्तर चलती रहती हैं।मौन प्रलाप, जो उसके रुके हुए पलों को गति देता है। कोई तकलीफ हो,वह बीमार हो ,मन ही मन उसकी बातें शुरु हो जाती हैं।नन्ही परी बलदेव के पास आ जाती है,

'क्यों परेशान होते हो बल्लू, तुम्हारे लिए चिंता करना ठीक नहीं'

'मैं इतनी जल्दी अपने कर्तव्य पूरे किये बिना नहीं जाऊँगा। तुम्हारे मम्मी पापा और तुम्हारे बहुत एहसान हैं मुझ पर।और देखो आज तक इन कौड़ियों को अलग नहीं किया मैंने,पर अब तुम्हें लौटाकर ऋणमुक्त हो जाना चाहता हूँ '।

कैसा अद्भुत, आलौकिक प्यार था यह।बिना किसी अपेक्षा के। निरंतर बहता हुआ। एक ऐसा सुकुमार सा तंतु जो एकदम झीना होने पर भी बेहद मजबूत है।

अन्तर में दबा हुआ प्रेम जो आज तक हरसिंगार के फूलों की तरह झरता रहता है। कभी ना खत्म होने वाली बचपन की बातें और वह कौडियां। एक ऐसा उपन्यास जो उपन्यास कम राजस्थान की सौंधी मिट्टी में रचा बसा बांधणी का खूबसूरत दुपट्टा ज्यादा लगता है। चटक ,रंगीन रंगों से सजा हुआ। 

राजस्थान की मीठी बोली के शब्द जैसे मन में शहद घोल देते हैं।

'मालिक! यह छोरा म्हारी मोटी बेन को बेटा है।इको थोड़ा महीना पेला व्याह होयो है।यो यू.पी के एक गांव में रेवे है।काम पे रखवा दो हुकुम।आपरी सेवा मा लाग्यो रैगा '

खेतों में झूमते हुए धान,गायत्री और अतीत के गलियारे,कंचों का रहस्य, तीज माता की पूजा , परी और बलदेव संवाद ,एक सरल,सहज,दुनिया की सैर कराते हैं।मौन संवाद बोलते से प्रतीत होते हैं।

मंजु महिमा जी की जितनी तारीफ करूं ,कम है ।वह जितने सुन्दर हाइकू लिखती हैं ,उतना ही सुंदर उनका यह प्रथम उपन्यास है।अठखेलियाँ करते हुए राजस्थानी भाषा के शब्द मोहक प्रतीत होते हैं।।बिल्कुल नहीं लगता कि यह उनका प्रथम उपन्यास है।एक उत्कृष्ट कृति हमें देने के लिए मंजु जी को साधुवाद। रंग-बिरंगे कंचों और कौड़ियों को सुन्दरता से पुस्तक रूप में बांधने के लिए प्रकाशिका नीरज शर्मा जी भी बधाई की पात्र हैं। किसी भी पुस्तक का बाहरी आवरण पृष्ठ ,मौन रहकर ही अन्दर की कहानी कह देता है।उसके लिए एकता व्यास को बधाई। 

बचपन की अठखेलियाँ, अनजाने से सपने,मासूम से ख्वाब, हवेली में खड़ा हरसिंगार। उपन्यास पूर्ण हुआ पर मेरा मन अभी भी उन लम्हों की खुशबू से महक रहा है। उन महकते एहसासों और झरते हरसिंगार के फूलों के साथ आपको छोड़े जा रही हूँ। बीन लीजिए इन पंक्तियों से कुछ कंचे ...कुछ कौड़ियां.......

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अपनी सहायिका दक्षा को अपना सामान पैक करने को कह गायत्री वाॅशरुम की ओर बढ़ गयीं। सामने दर्पण में उन्हें अपनी शक्ल की जगह एक नन्ही लड़की का चेहरा नजर आने लगा।जिसके कटे हुए घुंघराले बाल बेतरतीबी से इधर-उधर फैले हुए थे। हाथ में एक सुंदर सी गुड़िया थी,जो आंखें टिमटिमाती थी।पता नहीं अब तक वह कहाँ थीं....

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अपनी नन्ही परी को गायत्री के रुप में इतने ऊंचे स्थान पर देखकर, मैं सचमुच फूला नहीं समा रहा था।तुम्हारी भेंट, तुम्हारी प्रशंसा ने मुझे कितना आत्मबल और सहारा दिया है मैं बता नहीं सकता।तभी उसे कुछ ख्याल आया और बलदेव ने एक कागज की चिट ली ,उस पर कुछ लिखा और उसे अपनी कौडियों की डिबिया के नीचे बिछा दिया।

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जीवन की गति भी कैसी होती है ना।कभी उसमें सुख की हिलोरें उमड़ने लगती हैं।कभी दर्द के भंवर में इंसान फंस जाता है।ईश्वर के इस नाटक में कितनी नाटकीयता है।न जाने कैसी धुरी पर वह सबको घुमाता रहता है।

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अंत में दो पंक्तियाँ मेरी तरफ से.....

' शाम भी थी उदास उदास  /दिल भी था धुंआ धुंआ...../ दिल को कई कहानियाँ / बस याद आकर रह गई...

पुस्तक : कौड़ियां और कंचे / लेखिका--मंजु महिमा / प्रकाशक --वनिका प्रकाशन  / मूल्य ---- तीन सौ अस्सी