दिखी सोशल मीडिया की ताकत, हजारों की संख्या में उमड़े ग्रामीण...


ओम प्रकाश सिंह
अवधी बोली के उत्थान के लिए इकतीस दिसंबर की तारीख अवध के इतिहास में दर्ज हो गई। अयोध्या से चालीस किमी दूर चौरे बाजार के बावन बीघा मैदान में आने वाले हर रास्ते पर बच्चे, बूढ़े, महिलाओं, नौजवानों का रेला था। ये सब सोशल मीडिया के अवधी रील क्रिएटरों को सुनने देखने के लिए इकठ्ठा हो रहे थे। अवधी संगम के इस अनूठे आयोजन में अवधी बोली को भाषा के रुप में दर्ज कराने का भी संकल्प हुआ।
गुजरे साल का अंतिम दिन इकतीस दिसंबर। पूरे देश में जहां नववर्ष आगमन के लिए स्वागत तैयारियां हो रही थीं वहीं मानवेंद्र सिंह, सुनील राजपूत, मनीष सिंह, विनोद सिंह, इंजीनियर आनंद यादव, हरिओम सिंह, अर्जुन वर्मा की टीम ने अनूठा आयोजन कर डाला। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर अवधी बोली के साथ प्रस्तुति देने वाले सोशल मीडिया कलाकारों की जुटान किया। आयोजकों को भी उम्मीद नहीं थी कि इतनी भीड़ उमड़ेगी। वालंटियर्स के साथ प्रशासनिक व्यवस्था टाइट रही।

ठंड के आगोश में डूबे चौरे बाज़ार के बावन बीघा मैदान में अवधी की मिट्टी से निकले स्वरों का संगम हुआ। वहाँ हजारों दिल एक लय में धड़क रहे थे। लोकप्रिय क्रिएटर्स का एक अद्भुत मिलन हुआ। फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर अवधी में कॉमेडी, कहानियां, गाने और संस्कृति को जीवंत करने वाले कलाकार जैसे पीके अवधी, पल्लवी मिश्र सुल्तानपुर, बिट्टी के चाचा शरद-अमन, शिवांश, वायरल दादी, खाकी वाले गुरु जी, पुलिस अधिकारी अनिरुद्ध सिंह, चिथरु-मंगरु, बृजेश पंडित,पंपोस प्रतापगढ़ी, स्वतंत्र यादव, विकास शुक्ला, बैगन वाली चाची ज्ञानमती आदि कलाकारों ने रीयल प्रदर्शन कर समर्थकों को निहाल कर दिया।

लखनऊ वाले भैया के नाम से प्रसिद्ध मानवेंद्र सिंह की अगुवाई में यह आयोजन अवधी संस्कृति का जीवंत उत्सव बन गया, जहाँ डिजिटल दुनिया के सितारे वास्तविक धरती पर मिले, और भीड़ की तालियों ने अवधी की अमरता को नई उड़ान दी। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाषा की जड़ों का पुनर्जागरण था, जहाँ हँसी, संगीत और परंपरा का मेल एक काव्य बन गया। हजारों की भीड़ के हर हाथ में मोबाइल था। स्थिति यह थी कि नेटवर्क धीमा हो गया था। सोशल मीडिया की इस ताकत ने साबित किया कि लक्ष्य सकारात्मक हो तो साथ देने वालों की कमी नहींं।