पद्मा प्रसाद’विन्देश्वरी’, जमशेदपुर 

यात्रा जीवन का वह रंग है,जो न केवल नई जगहों से परिचित कराता है, बल्कि आत्मा को भी समृद्ध करता है ।मेरी अज़रबैजान यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही- जहॉं प्रकृति,इतिहास,संस्कृति और आधुनिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला ।अन्यथा जीवन के सुंदर पहलुओं से हम अछूते रह जाते ।कभी-कभी ऐसा लगता है कि ईश्वर की बनाई प्रकृति का आनंद यात्रा के दौरान ही भरपूर मिल पाता है ।देश-विदेश सबकी लीला सचमुच अवर्णनीय है ।

इस बार जब अज़रबैजान जाने की सूचना मिली तो बड़ा अच्छा लगा क्योंकि यह मेरे लिए नई जगह थी।हॉं बचपन में भूगोल की पढ़ी कुछ यादें जो मिट्टी के ज्वालामुखी के बारे में पढ़ा था स्मरण हो आया । परंतु आर्मेनिया और अज़रबैजान को लेकर जो आए दिन युद्ध छिड़ता रहता है उसको लेकर थोड़ा सा चिंतित थी परंतु अपनी रक्षा की ज़िम्मेवारी पूर्णतया ईश्वर पर छोड़ निश्चिंत हो गई।


यात्रा के लिए १२-१७ तारीख़ २०२३ का दिन तय हुआ ।११ सितंबर की शाम सवा चार में रॉंची से दिल्ली की उड़ान थी ।उस दिन अप्रत्याशित घटना कहें या दिलचस्प ………जिससे ऐसा लगा कि कहीं भगवान हमें जाने से रोकने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसा हुआ कि उसी दिन डेंगू के बढ़ते मामलों के बीच मरीज़ों के अनुनय करने पर मेरे पति (डॉ. एस. के. प्रसाद) को स्टील सिटी हॉस्पिटल ,बिष्टूपुर जाना पड़ा ।जल्दी करने पर भी घर आने पे क़रीब १२ बज गए ।इधर घर में भी तीन मरीज पहले से प्रतीक्षा कर रहे थे।किसी तरह जल्दी करते हुए भी साढ़े बारह बज गए क्योंकि एक मरीज काफ़ी सीरियस था जिसे समझाने में वक़्त लगा वो पुरूलिया से जमशेदपुर दिखाने आया था। उस वक़्त मरीज़ों के प्रति समर्पित इस ”महान व्यक्तित्व“ को नमन करते हुए मन आत्मविभोर हो उठा था। मैंने जल्दी-जल्दी सारा सामान समेटा और नीचे गाड़ी में भिजवा दिया। जल्दी से दही चीनी खाने दिया और हम दोनों घर को बंद करके जल्द से जल्द नीचे गाड़ी में बैठ गए और हमारी गाड़ी अपने गंतव्य स्थान के लिए प्रस्थान कर गई और सदा की तरह मंत्रोच्चार करते हुए विदा ली :

“सदा भवानी दाहिने,सम्मुख श्रीगणेश।

पंचदेव रक्षा करे,ब्रह्मा विष्णु महेश॥”

अब जब मैंने घड़ी की ओर नजर डाली तो सवा एक बज रहा था और ईश्वर की मदद के बिना चेकिंग के समय (सवा तीन)तक पहुँचना असंभव सा लग रहा था। तब मैंने ईश्वर को बड़े ही सच्चे मन से याद किया। उस दिन ईश्वर की कृपा कहें या मरीज़ों की दुआ या ड्राइवर की सतर्कता कि ठीक सवा तीन बजे हमारी गाड़ी राँची एयरपोर्ट के सामने खड़ी थी।और आश्चर्य! फ्लाइट ३० मिनट देरी से थी ।उस समय हमें इतना रिलैक्स महसूस हुआ कि उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। फिर फ़्लाइट से हम लोग दिल्ली आ गए ।


बाकू में आगमन : आग की भूमि का स्वागत

१२ सितम्बर को दिल्ली से उड़ान भरकर 10.15 बजे हम बाकू पहुँचे । उस वक़्त हमारे देश में पौने 12 बज रहा था, यानी डेढ़ घंटे का अंतराल। हवाईअड्डे पर पारंपरिक नृत्य और संगीत से हमारा स्वागत हुआ ।बहुत सारे डॉक्टर भी नृत्य में शामिल हो आनंद उठाये। तत्पश्चात् हम सभी 79 लोग दो बसों में सवार होकर अपने सामानों के साथ अपने होटल “Sheraton Baku Intourist” जो कैस्पियन सागर के ठीक सामने था।हमसभी लोग चेकिंग के लिए आ गए। अपने रूम में फ़्रेश होने के बाद डेढ़ बजे तक हम लोग इंडियन रेस्टोरेंट में खाना खाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में गाइड ने हम लोगों को बहुत सारी बातें बताईं ।अज़रबैजान को “आग की भूमि” के रूप में जाना जाता है ,अज़र का मतलब “आग”।यह पूर्वी यूरोप और एशिया के मध्य में बसा हुआ। भौगोलिक रूप से यह एशिया का ही भाग है। इसके सीमांत देश हैं: अर्मेनिया, जॉर्जिया, रूस, ईरान, तुर्की और इसका तटीय भाग कैस्पियन सागर से लगता हुआ है। “बाकू” इसकी राजधानी है और यहाँ की मुद्रा “मनत” हैं। अज़रबैजान “मुस्लिम बहुल देश” है,जहाँ क़रीब 95-97% तक मुस्लिम और बाक़ी के ईसाई धर्म को मानने वाले हैं। कैस्पियन सागर के किनारे बालू जैसी चीज़ें नहीं थी जिससे लोग समुद्र का आनंद नहीं उठा सकते थे। वहाँ तेल बहुतायत से निकलता है और वही देश की आर्थिक स्थिति को बहुत ही मज़बूत बनाता है जो उसकी अमीरी को दर्शाता है। City View देखते हुए हमलोग हाइलैंड पार्क पहुँच गए । ऊपर से City का नज़ारा देखने लायक था। फिर हम लोग बस में आ गए ।बस से Baku flame, Tower का लाइटिंग देखने में बहुत मज़ा आया जैसे लग रहा था कि उसे आग की लपटें उठ रही है। फिर हमलोग “Gala dinner ke Liye” इंडियन रेस्टोरेंट में आ गए। सभी लोगों ने भरपूर आनंद उठाया तत्पश्चात् बस से हम लोग अपने होटल आ गए।



अग्नि मंदिर और धधकती धरती

दूसरे दिन 13 सितंबर सुबह ब्रेकफास्ट के बाद बाकू के पास का अतेशगाह घूमने निकले।अज़रबैजान की शाश्वत आग का यह एक प्रसिद्ध स्थल है। अतेशगाह का अर्थ है 'अग्नि का मंदिर'। यह पंचकोणीय परिसर, जिसमें भिक्षुओं के लिए कक्षों से घिरा एक आंगन और बीच में एक चतुष्कोणीय-वेदी है।इसे 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान बनाया गया था। आग सीधे परिसर के नीचे स्थित एक भूमिगत प्राकृतिक गैस क्षेत्र के वेंट से लगी थी।लेकिन सोवियत शासन के दौरान इस क्षेत्र में प्राकृतिक गैस भंडार के भारी दोहन ने मंदिर में प्राकृतिक गैस के प्रवाह को समाप्त कर दिया और 1969 में पवित्र अग्नि को बुझा दिया। आग बुझते ही मंदिर को संग्रहालय में बदल दिया गया। हमने जो आग देखी वह बाकू शहर से आने वाली मुख्य गैस से आती है।


उसके बाद हम लोग “लैंड ऑफ फायर (Land of Fire)” देखने गए ,जो अजरबैजान की राजधानी बाकू (Baku) के पास है।इसकी वजह से पूरे अजरबैजान को भी 'आग की धरती' के नाम से जाना जाता है।दरअसल यानार डग (Yanar dag)नाम का पहाड़ है,जिसे देखने हम लोग गये कि वहाँ कैसे प्राकृतिक गैसों के रिसाव के कारण हमेशा आग लगी रहती है। इसका हम लोगों ने वीडियो भी लिया ।अज़रबैजान के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से यह एक है जो कैस्पियन सागर के किनारे एक पहाड़ी पर जलती हुई प्राकृतिक चमकती आग है। अपने नाम के अनुरूप, यह पर्वत कम से कम 65 वर्षों से धधक रहा है । वहाँ हम लोग इंडियन रेस्टोरेंट में लंच लेने के बाद हमसभी Milli Park n Heydar Aliyev center गए। आधुनिक अज़रबैजान का प्रतीक माना जाने वाला हेदर अलीयेव सेंटर वास्तव में देखने लायक है। इस वास्तुशिल्प उत्कृष्ट कृति को दिवंगत और महान ज़ाहा हदीद द्वारा डिजाइन किया गया था और 2014 में लंदन डिजाइन संग्रहालय के डिजाइन ऑफ द ईयर पुरस्कार जीता था। यह अपने अद्वितीय वक्रों और अंदर अद्वितीय प्रदर्शनियों और संग्रहालयों की संख्या के लिए प्रसिद्ध है। उसके बाद हमलोग इंडियन रेस्टोरेंट में खाना खाने चले आए ।वहाँ नृत्य का लुत्फ़ उठाते हुए लोगों ने डिनर लिया और फिर अपने होटल विश्राम के लिए आ गए ।

पुराना शहर: इतिहास की गलियों में

तीसरे दिन (14 सितंबर )सुबह हमलोग नास्ता करके निकल गए। उस दिन Old City or Inner City ,the Old City of Baku, including the Palace of the Shirvanshahs,Maiden Tower” जिसे UNESCO ने लिया है , हम लोगों ने बाहर से ही पूरा देखा क्योंकि भीतर जाने की इजाज़त नहीं थी । हम लोगों ने टावर के सामने फ़ोटोग्राफ़ी की ।फिर हमलोग Local shops/Mousque/Streets जगहों पे घूमने गये और अंत मे Nizami Street शॉपिंग के लिए आ गए । वहाँ से हम लोग अपने होटल आ गए । उस दिन थोड़ी थकावट हो गई थी इसलिए हम लोग और कुछ अन्य डॉक्टर्स इंडियन रेस्टोरेंट में खाना खाने नहीं गए बल्कि होटल में रूम में खाना मँगाकर खा लिए ।


गोबुस्तान : प्राचीन कला और मिट्टी के ज्वालामुखी

चौथे दिन (15 सितंबर )सुबह हमलोग ब्रेकफ़ास्ट लेकर गोबुस्तान के लिए चल पड़े जिसकी अपनी रॉक कला उत्कीर्णन की गुणवत्ता का विशेष महत्व है। प्रागैतिहासिक काल में शिकार, जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और जीवन शैली के लिए प्रस्तुत रॉक कला छवियों के संग्रह के पर्याप्त सबूत देखने को मिले।अज़रबैजान आश्चर्यजनक मात्रा में ज्वालामुखियों का घर है।अज़रबैजान में ज्वालामुखियों की संख्या आश्चर्यजनक है।वास्तव में लगभग 350 और ये कोई ज्वालामुखी नहीं हैं बल्कि ये मिट्टी के ज्वालामुखी (Mud Volcano)हैं। बहुत लोग बहुत लंबे करछुल से मिट्टी को ले जा रहे थे,उनके अनुसार वो मिट्टी चेहरे और बालों के लिए काफी फायदेमंद साबित होती है ।हमारे पास गर्म लावे को ले जाने की असुविधा के कारण न ले आ सकी।अज़रबैजान को मिट्टी के ज्वालामुखियों के लिए पृथ्वी पर सबसे अधिक केंद्रित राष्ट्र बनाता है। जिनमें से कुछ 20 मिलियन वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।

विदाई की पूर्व संध्या

पाँचवा दिन (16 सितंबर) इस यात्रा का अंतिम दिन था। उस दिन ब्रेकफास्ट लेने के बाद हम लोग 10 बजे तक की चेक आउट के लिए लॉबी में आ गए । सबका समान बस में रखा गया और दोनों बसें चल पड़ी। उस दिन शॉपिंग की पूरी छूट थी। घूमने का कोई ख़ास काम नहीं था ।अज़रबैजान में खाने पीने से लेकर कपड़े लत्ते और बाक़ी सारी सामानें आयात होती हैं । अतःबहुत ज़्यादा शौपिंग करना उचित नहीं था क्योंकि वहाँ सामान भारत से भी महँगा था । हाँ ! वहाँ का अंजीर मुझे बहुत अच्छा लगा जिसका स्वाद अत्यंत लाजवाब था ।वैसा भारत में नहीं दिखता है, वो भी उनके यहाँ अफ़ग़ानिस्तान से आता है। सिर्फ़ तेल और गैस का वहाँ अपूर्व भंडार है।


लंच के लिए हम लोग इंडियन रेस्टोरेंआ गए।लंच के बाद हम लोगों ने थोड़ी बहुत शॉपिंग की ,फिर तो घूमते -घामते हम लोग एयरपोर्ट की ओर रवाना हो गए और आठ बजे वहाँ पहुँच गए क्योंकि पौने बारह बजे हमारे देश की राजधानी दिल्ली के लिए फ़्लाइट थी। बस से उतरने के बाद सब को डिनर पैक मिल गया। एयरपोर्ट में घुसने के बाद सबसे पहले सब लोगों ने खाना खाया और उसके बाद चेक इन के लिए चले गए।


17 सितंबर की सुबह साढ़े पाँच बजे हम लोग अपने प्यारे भारत देश की धरती पर क़दम रखा तो बड़ा सुकून मिला क्योंकि अपना देश अपना ही होता है। अपने देश वापस आने पर महसूस होता है कि हमारे देश में भारतीयों में जितना अपनापन है ,अन्यत्र कहीं नहीं……….। फिर हम लोगो की 8.10 am में राँची की फ़्लाइट थी जिससे हम लोग 10.30am में राँची आ गए । उसके बाद हम दोनों कार में सवार हो गए और हमारी कार अपनी प्यारी लौह नगरी जमशेदपुर की ओर सरपट दौड़ पड़ी……… गंतव्य की ओर।यह यात्रा केवल एक देश का भ्रमण नहीं थी , यह आत्मिक और बौद्धिक समृद्धि का अनुभव थी।यहॉं के प्राचीन चिन्ह,आधुनिक स्थापत्य और प्राकृतिक रहस्य- सबने मिलकर हमें भीतर से बदल दिया । यही एक सच्ची यात्रा की सार्थकता है - जो हमें नया बनाती है और जीवन भर हमारे साथ चलती है ।