आज काशी विश्वनाथ धाम में 50 हजार श्रद्धालु एक साथ दर्शन करते है : मुख्यमंत्री

लखनऊ : 17 जनवरी, 2026 : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने कहा कि विगत 11 वर्षों के अन्दर हुए समग्र विकास की परियोजनाओं को बाधित करने के लिए साजिशें रची जा रही हैं और दुष्प्रचार किया जा रहा है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि काशी अविनाशी है तथा काशी के प्रति प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी और भारतवासी अपार श्रद्धा का भाव रखता है। स्वतन्त्र भारत में काशी को जो सम्मान मिलना चाहिए था, जो विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। समग्र विकास के कार्यक्रम को वह महत्व नहीं मिला, जो आजादी के तत्काल बाद प्राप्त होना चाहिए था। विगत लगभग साढ़े 11 वर्षां के अन्दर काशी अपनी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए उनका संवर्धन कर रही है और भौतिक विकास के कार्यों के माध्यम से नई ऊंचाइयां प्राप्त कर रही है। काशी को एक नई वैश्विक पहचान प्राप्त हुई है।

मुख्यमंत्री  ने कहा कि वर्ष 2014 से पूर्व काशी के अन्दर श्रद्धालुओं की औसत संख्या 05 हजार से लेकर अधिकतम 25 हजार तक पहुंचती थी। आज उसी काशी में श्रद्धालुओं की औसत संख्या सवा लाख से लेकर डेढ़ लाख प्रतिदिन है और पीक सीजन अर्थात सावन मास, शिवरात्रि और अन्य  महत्वपूर्ण आयोजनों में यह संख्या 06 लाख से 10 लाख तक पहुंचती है। विगत वर्ष में ही काशी में 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ धाम में दर्शन किये। उन्होंने काशी के समग्र विकास को देखा और यहां चल रही विकास योजनाओं में अपना योगदान किया। काशी विश्वनाथ धाम बनने के बाद से अब तक अकेले काशी ने देश की जीडीपी में 1.3 लाख करोड़ रुपये का योगदान किया है। यहां रोजगार के नए अवसर सुलभ हुए हैं। गाइड, पुरोहित कर्म, व्यापार, फूल-माला और प्रसाद बेचने के साथ ही रेस्टोरेंट, होटल, टैक्सी और अन्य सभी कार्यों के लिए यह समग्र विकास के आयाम हैं।


मुख्यमंत्री जी ने कहा कि काशी की पहचान बाबा विश्वनाथ मंदिर और मां गंगा से है। वर्ष 2014 से पूर्व काशी में गंगाजल आचमन तो दूर, स्नान करने लायक भी नहीं था। आज काशी के अन्दर कोई भी गंगाजल देखता है, तो अभिभूत होता है। आज गंगाजल का आचमन भी कर सकते हैं और इसमें स्नान भी कर सकते हैं। काशी की पहचान काशी के घाट हैं। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वर्ष 2014 के पहले इन घाटों की कैसी दुर्गति थी। आज यह घाट प्रत्येक भारतीय को आकर्षित करते हैं। अपनी पुरातनता के साथ-साथ आधुनिक कलेवर में स्वच्छ और सुंदर दिखाई देते हैं। काशी में देश के सबसे बड़े घाट के रूप में नमो घाट काशी के साथ-साथ पूरे देश को जोड़ने का एक माध्यम बना है। काशी तमिल संगमम् के आयोजन भव्यता के साथ नमो घाट पर आयोजित होते हैं। हजारों की संख्या में काशीवासी, पूर्वांचल वासी और देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु यह दृश्य देखकर अभिभूत होते हैं।


मुख्यमंत्री  ने कहा कि 100 वर्ष पूर्व माता अन्नपूर्णा की मूर्ति चोरी करके यूरोप पहुंचा दी गई थी। प्रधानमंत्री जी के प्रयास से मूर्ति काशी में वापस आई और बाबा विश्वनाथ धाम में उसकी स्थापना हुई। आखिर यह प्रयास 1947 से लेकर के लगातार रहने वाली काँग्रेस की सरकारों ने यह प्रयास इसलिए नहीं किए क्योंकि उनके मन में भारत की विरासत के प्रति सम्मान का भाव नहीं था। उनको इन सब कार्यों से परहेज था ।

 मुख्यमंत्री  ने कहा कि काशी विश्वनाथ धाम काशी को एक नई वैश्विक पहचान दिलाने और इसके माध्यम से आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधा उपलब्ध कराने के साथ ही कृतज्ञता ज्ञापित करने का भी एक माध्यम बना। औरंगजेब के द्वारा तोड़े गए बाबा विश्वनाथ मन्दिर का पुनरुद्धार करने का काम सबसे पहले लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने किया था, जिन्हें काँग्रेस ने कभी सम्मान नहीं दिया। प्रधानमंत्री मोदी  के कारण लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर और आदि शंकराचार्य की प्रतिमा को काशी विश्वनाथ धाम में महत्व मिल पाया है। आज कुछ लोग काशी के इस समग्र विकास के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए नमामि गंगे के माध्यम से गंगा की निर्मलता और अविरलता को बनाए रखने के प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा किए गए प्रयास में विभिन्न प्रकार की साजिशें करके उनमें अवरोध पैदा करने का काम कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा प्राचीन काल से ही काशी की आध्यात्मिक परम्परा के साथ ही अगर हम काशी के अन्दर किसी संकल्प के साथ जुड़ते हैं और बाबा विश्वनाथ धाम में पूजा अर्चना करते हैं, तो महाश्मशान की चर्चा होती है। यहां के दो महत्वपूर्ण श्मशानों, हरिश्चन्द्र घाट और मणिकर्णिका घाट पर प्राचीन काल से ही सनातन धर्मावलम्बी आते रहे हैं। वे जीवन की अंतिम यात्रा को विसर्जन करने तथा अपने प्रियजनों के अन्तिम संस्कार के साथ उन्हें अग्नि संस्कार देने के लिए यहां आते हैं। अन्तिम संस्कार सनातन धर्म के 16 संस्कारों में महत्वपूर्ण संस्कार है।