भारत देश में वसंत ऋतु का आगमन फरवरी के मध्य बंसत पंचमी से शुरु होकर मार्च के अंत तक होते-होते अप्रैल माह तक रहता हैं । इस ऋतु में मौसम बड़ा सुहावना होता हैं और प्रकृति में नए जीवन जैसे फूलों का खिलना , चारों और पेड़-पौधों में नई उर्जा का संचार होता हैं , पौधों में फूल खिलने की शुरुआत होती हैं , पेड़ों पर नए-नए पत्ते आते हैं , और जो पेड़ पत्ते गिरने की तैयारी में होते है , वसंत ऋतु उन्हें भी नया जीवन देती हैं । इसलिए वसंत ऋतु को “ऋतुराज” ऋतुओं का राजा कहा जाता हैं ।
ऋतुराज वसंत में देवी सरस्वती की पूजा , फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर महाशिवरात्रि , फाल्गुन पूर्णिमा का बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार होली एवं रंगपंचमी , मराठी , कन्नड़ , तेलुगु नव वर्ष गुड़ीपड़वा , चैत्र नवरात्रि और रामनवमी , माँ दुर्गा की पूजा और भगवान राम का जन्मोत्सव । बैसाखी पंजाब का फसल त्यौहार व खालसा स्थापना दिवस , बिहु और विशु असमिया और केरल का नववर्ष , हनुमान जयंती चैत्र पूर्णिमा पर भारत देश के चहुंओर फरवरी से अप्रैल माह में प्रकृति के सौंदर्य में उत्सव का भक्ति भाव हैं । इस्लाम त्यौहार रमज़ान के रोज़े के महीने की शुरुआत होकर ईद- उल - फितर त्यौहार रहते । मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित मालवा क्षेत्र एक प्रमुख भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र हैं । इसी में इन्दोर संभाग – इन्दौर , धार , झाबुआ , अलीराजपुर , बड़वानी , खरगोन , खंडवा और बुरहानपूर यह क्षेत्र समृद्धि मालवी-नीमाडी भाषा संस्कृति और कृषि आधारित संस्कृति हैं । अपने-अपने क्षैत्रों में हाट – बाजार , व्यापार – व्यवसाय के साथ – साथ मेलों का आयोजन होने लगा हैं । धार क्षेत्र में भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के समय से हुई थी । उस समय दो भील राजाओं कासूमार और बालुन ने अपनी राजधानी भगोर में मेले का आयोजन करना शुरु किया । जिससे हाट ओर मेलों को भगोरिया कहने का चलन बन गया । जो आनंदित होकर व्यापार-व्यवसाय के साथ उल्हास से मनाते हैं । यह जीवन ओर प्रेम का उत्सव हैं , जो संगीत , ढोल , मादल पर सभी नृत्य कर समूहों में थिरकते है । रंगबिरंगे परिधान पहनकर और ड्रेस कोड में मनमोहक नृत्य , गीत पर आकर्षक लगते हैं ।
उत्सव व धर्म के आगाज में बदनावर नगर भक्ति भाव , धर्म व आस्था का बड़ा केन्द्र रहा हैं । मध्यकाल से पूर्व वर्धमानपुर के नाम से जाना जाता था । बदनावर शहर का प्रसिद्ध तीर्थ कोटेश्वर महादेव धाम में भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी हरण के दौरान यहां विश्राम किया था और अपने हाथों से शिवलिंग की स्थापना की थी । इसी तरह यहां पर महाभारत कालीन एकवीरा देवी का मंदिर जिन्हें पांडवों की कुलदेवी भी कहां जाता हैं । बदनावर में खुदाई में प्राचीन मूर्तियां प्राप्त होती हैं । बदनावर के आसपास प्राचीन पुरातत्व के धरोवर है -
प्राचीन धरोवर में श्री बैजनाथ महादेव मंदिर बदनावर -
1100 साल पुराने परमारकालीन श्री बैजनाथ महादेव मंदिर को उड़निया मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं । मंदिर संबंधी ऐसी मान्यता हैं कि पूर्व काल मे कोई तपस्वी अपने तपोबल से इस मंदिर को उड़ाकर ले जा रहे थे , लेकिन सूर्योदय का समय होते ही उन्हें यहां स्थापित करना पड़ा । उड़िया शैली में निर्मित होने के कारण इसे उड़निया मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं ।
यह मंदिर उडिसा के प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर की अनुकृति समान हैं । किवदंती के अनुसार इसे कोई यक्ष या यति उडाकर लाया । इसलिए यह उडिया मंदिर कहलाया वस्तुतः यह उडिया शैली से बना हुआ हैं । मंदिर भव्य व विशाल हैं । शिखर की ऊँचाई 80 फिट हैं । मान्यतानुसार मंदिर के तल में भी एक मंदिर हैं । यहाँ बैजनाथ महादेव की अर्चना होती हैं । प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर आयोजन होते हैं तथा चैत्रमास में नगर पालिका की और से मेला लगाया जाता हैं । मंदिर प्रांगण में प्राचीन मूर्तियां संग्रहित हैं ।
श्री बाबा बैजनाथ महादेव मेला (प्राचीन फूल डोल मेला ) नगर परिषद बदनावर में 128 साल से अधिक पुरानी पंरपरा वाला ऐतिहासिक 9 दिवसीय हैं । इस वर्ष मेला अध्यक्ष . नगर परिषद अध्यक्ष मीना यादव की अध्यक्षता में साधारण सभा में पार्षद चेनाबाई डाबर को बनाया मेला समिति का अध्यक्ष 2026 । यह मेला 15 मार्च 2026 से 23 मार्च 2026 , 9 दिवसीय रहेगा । गगनचुंबी ब्रेक झूले का आकषर्क , CCTV व महिला बाउंसर , भगवान बालाजी मंदिर से फूलों से सजे डोल में राधा-कृष्ण की मूर्तियां लाते हैं । इसे पहले "फुल डोल " मेला कहां जाता था । मेला समापन पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन होता हैं , जिसमें प्रसिद्ध कवि भाग लेते हैं ।वर्तमान में ओमकार पूरी गोस्वामी मंदिर के पूजारी हैं ।
महाशिवरात्रि , श्रावण मास में बड़ी संख्या में श्रद्दालुओं आते हैं , सभी की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । मंदिर पुरातत्व विभाग के अधिन हैं । मंदिर बाहर व अन्दर से मनमोहक हैं । यह मंदिर 1984 से पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं । वर्तमान में विशेषज्ञों की टीम (अहमदाबाद) द्वारा सर्वे व जीर्णोद्धार किया जा रहा है।
स्थापत्य: यह पाषाण निर्मित (पत्थर) मंदिर है, जो परमारकालीन वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें शिखर, जंघा और वेदीबंध हैं। जीर्णोद्धार: अहमदाबाद की टीम द्वारा आधुनिक मशीनों से जांच की जा रही है, जिसमें गर्भगृह, शिलालेख और नक्काशी पर ध्यान दिया जा रहा है।
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