इतिहास की स्याही बहुत सौभाग्य से मिलती है , निकला निष्कर्ष
इंदौर से लौटकर प्रदीप श्रीवास्तव / लखनऊ । बीते 30 व 31 मार्च को ​साहित्य की नगरी इंदौर में 'देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं पर केंद्रित दो दिवसीय गहन विमर्श का आयोजन मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित हुआ । जिसका विषय था "वीणा की वाणी" । जिसमें देश भर की लघु पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने भाग लिया देवी अहिल्या विश्वविद्यालय केसभागार में आयोजित इस कार्यक्रम ने साहित्य, पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक के अंतर्संबंधों पर नई दृष्टि साझा की।उद्घाटन सत्र में मंच पर श्री उमापति दीक्षित जी, डीएवीवी के कुलगुरू राकेश सिंघई जी, राकेश शर्मा जी (संपादक 'वीणा'), मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ विकास दवे जी एवं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की विभागाध्यक्ष सोनाली सिंह नरगुंदे जी उपस्थित रहे ।
स्वागत उद्बोधन में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे जी ने बताया की साहित्य जगत में अगर कार्य करना है तो समरसता की भावना लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि कर्नाटक की एक शोधार्थी बहन किसी गांव में अक्षम बच्चों को संस्कृत भाषा में प्रशिक्षित करने का प्रयास कर रही थी और किस प्रकार से उस गांव में उन्होंने जाति भ्रम को दूर कर सभी के बीच समरसता का भाव पैदा किया। ऐसे हमारे देश में अनेकों जीवन्त उदाहरण है, युवा बंधु-भगिनी है, जो इस प्रकार के कार्य को कर रहे हैं।हम इन पत्रिकाओं को एक सूत्र में बांधना चाहते हैं। डाॅ विकास दवे ने बताया कि इन दो दिवस में किस प्रकार से साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं के विषय पर विस्तृत चर्चा हुई और एक से एक धुरंधर पत्रकार एवं साहित्यिक मनीषियों ने अपने विचार व्यक्त किए । उन्होंने श्री कृष्ण बेड़ेकर जी का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उस समय में आप अंतर्देशीय साहित्य पत्रिका का हस्तलिखित संपादन करते थे। यह बहुत साधारण बात नहीं थी, कितनी मेहनत लगती है यह हम सभी भली भांति जानते है।उन्होंने लघु कलेवर की पत्रिकाओं के संकट पर भी विचार व्यक्त किए।
मुख्य वक्ता राकेश शर्मा जी संपादक 'वीणा' ने अपने उद्बोधन में रेखांकित किया कि हिन्दी पत्रकारिता अपने 200 गौरवशाली वर्ष पूर्ण कर रही है, जो हम सभी के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने 'वीणा' पत्रिका के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 'वीणा' का अर्थ ही 'वागर्थ' है। सत्र के दौरान उन्होंने इस बात पर बल दिया कि 'साहित्य स्थाई पत्रकारिता है' और 'पत्र-पत्रिका स्थाई साहित्य हैं'। उन्होने स्पष्ट किया कि इतिहास की स्याही बहुत सौभाग्य से मिलती है और वही तथ्य दर्ज होते हैं जो सोच-समझकर पदचाप के साथ चलते हैं। तकनीक के बदलते दौर पर चर्चा करते हुए शर्मा जी ने कहा कि एक समय था जब मनुष्य के जीवन में मशीनों के पूर्व और बाद के साहित्य में अंतर आया था, अब AI के प्रवेश से पूर्व और बाद के साहित्य में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। यह एक विकट समय है, क्योंकि जब तक कविता हाथ से लिखी जाती थी, उसमें प्राण थे, लेकिन AI और तकनीक की संवेदना उस गहराई तक नहीं पहुँच सकती।
पत्रिकाओं का योगदान के संदर्भ में बात करते हुए राकेश शर्मा ने बताया की 1903 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में 'सरस्वती' पत्रिका ने हिन्दी साहित्य की जो प्रतिष्ठा गढ़ी, उस परंपरा को आगे बढ़ाने में देवनागरी और अन्य पत्रिकाओं के योगदान को याद किया उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास की स्याही है जो बहुत सौभाग्य से मिलती है। 'वीणा' जैसी पत्रिकाएँ सत्य को आगे बढ़ाने और भ्रम को ध्वस्त करने का माध्यम हैं। विमर्श के दौरान यह कड़ा संदेश भी दिया कि जो राजनीति के लिए अपना चोला बदलता है, वह कुछ भी हो सकता है, लेकिन वह एक सच्चा व्यक्ति या साहित्यकार कभी नहीं हो सकता। उमापति दीक्षित जी ने उद्बोधन के साथ शिव तांडव स्त्रोत का पाठ किया। कार्यक्रम में राकेश सिंघई जी ने अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों के संस्मरण साझा किए, जहाँ साहित्य और समीक्षा की जीवंत परंपरा थी।आपने भाषा की सजगता पर ध्यान इंगित किया।
द्वितीय दिवस का शुभारंभ भी दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ । सत्र का मुख्य विषय 'छपास की भूख' (प्रसिद्धि की लालसा) के कारण साहित्य के गिरते स्तर और संपादकों द्वारा अपने मूल धर्म (नैतिकता और चयन की शुचिता) से विमुख होने पर तीखा प्रहार था। शोभा जैन ने रेखांकित किया कि आज की रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही है। 'छपास की भूख' को एक 'मानवीय उत्कंठा' के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार: निराला और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान रचनाकारों के लिए 'छपास' एक सृजनात्मक संतोष का विषय था, जो आज के लेखकों में केवल संख्यात्मक वृद्धि तक सीमित रह गया है। सरस्वती' (1904) जैसी पत्रिकाओं और महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन आदर्शों को आज के संपादकों के लिए मार्गदर्शक बताया, जिन्होंने निराला की 'जूही की कली' जैसी कालजयी रचना को भी परिष्कृत करने का साहस दिखाया था। 'धर्मयुग' और धर्मवीर भारती का उदाहरण दिया गया, जिन्होंने 1980 में 5,07,000 प्रतियों का कीर्तिमान रचा था, जो गुणवत्ता और लोकप्रियता के समन्वय का प्रतीक है।
संपादकीय कटाक्ष करते हुए शोभा जैन ने उन संपादकों पर कड़ा प्रहार किया जो साहित्य के स्तर को गिराकर महिलाओं के अंतरंग विषयों या सतही सामग्री को स्थान देते हैं। उन्होंने संपादकों को 'आत्म-अवलोकन' की सलाह दी उन्होंने रचनाकारों से अपनी रचना भेजने से पहले पत्रिका की प्रकृति को समझने और एक साथ दर्जनों संपादकों को रचना भेजने की प्रवृत्ति से बचने का आग्रह किया गया।संपादकों से तीन मुख्य आग्रह भी किये ​एक सफल और धर्मनिष्ठ संपादक के लिए तीन गुणों को अनिवार्य बताया * ​बहुश्रुत होना: व्यापक जानकारी और सुनने की क्षमता। * ​बहुपठित होना: गहन अध्ययन और साहित्य की समझ। * ​सृजकों से अधिक समृद्ध होना: बौद्धिक और भाषाई स्तर पर रचनाकार से श्रेष्ठ होना ताकि वे रचना का सही मूल्यांकन और परिष्कार कर सकें।
प्रेम जनमेजय जी ने शोभा जैन जी के विचारों पर बात करते हुए संपादन कला पर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि सभी संपादकों को एक ही कतार में खड़ा करना उचित नहीं है। हर संपादक की अपनी दृष्टि और कार्यशैली होती है। उन्होंने 'छपास की भूख' (छपने की तीव्र इच्छा) पर प्रहार करते हुए कहा कि इसे भूख नहीं, बल्कि 'अभिव्यक्ति का अतिरेक' कहना चाहिए। संपादक उत्तरदायित्व पर कहा: एक अच्छे संपादक का कार्य केवल रचना छापना नहीं, बल्कि अच्छे लेखक और जागरूक पाठक तैयार करना है। उन्होंने जोर दिया कि संपादक को तटस्थ होना चाहिए, स्वार्थी नहीं। व्यंग्य की परंपरा पर उन्होंने कबीर से व्यंग्य की धारा के प्रारंभ होने की बात कही और तुलसीदास के 'परशुराम-लक्ष्मण संवाद' व 'अंगद-रावण संवाद' को व्यंग्यात्मक संवाद के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखने की सलाह भी दी।उन्होंने लेखकों में बढ़ती 'आत्ममुग्धता' और 'सम्मान-लिप्सा' पर चिंता व्यक्त की।
सूर्यकांत नागर - मनस्वी पत्रिका ने कहा कि बड़े से बड़े साहित्यकार भी आज 'येन-केन-प्रकारेण' छपने की कोशिश में रहते हैं। नए लेखकों को इस 'छपास की भूख' से बचना चाहिए। उन्होंने एक संस्मरण साझा किया कि कैसे एक बार शरद जोशी जी और कमलेश्वर जी ने नागर जी से रचना मांगी थी, लेकिन रचना पसंद न आने पर उसे वापस लौटा दिया था। यह एक संपादक की ईमानदारी का परिचायक है। उन्होंने कहा कि मैंने भी उसे सहजता से स्वीकार किया, जरूर मेरी ही रचना कमजोर होगी और प्रारंभिक चरण में यह सभी के साथ होता है। उन्होंने लेखकों के लिए सुझाव दिया कि लेखक के लिए 'धैर्य' सबसे बड़ी पूंजी है और 'जल्दबाजी' सबसे बड़ी कमजोरी। पहले बाहर की दुनिया को समझो, पढ़ो, फिर मूल्यांकन करो। समझ से पहले समझाना गलत है।
संपादक की गरिमा: संपादक को अपने अहंकार से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टि से कार्य करना चाहिए। यदि किसी की रचना अस्वीकार करनी हो, तो उसे सीधे मना करने के बजाय सुझाव देना चाहिए कि 'कुछ और लिखकर भेजें, इस विषय पर गहराई की कमी है।' हर बात कहने का एक सलीका होता है। प्रथम सत्र की संपन्नता के बाद आने वाले सत्रो में देशभर से पधारे पत्र पत्रिकाओं के संपादक उपस्थित थे उन्हीं में से कुछ संपादकों ने अपनी पत्रिका के बारे में बात की। राहुल अवस्थी जी ने स्पष्ट किया कि एक संपादक को संबंधित विधा और विषय से पूरी तरह परिचित होना चाहिए। शुभदा पांडे, संजीव सिंहा, राहुल जी , किशोर जी आप सभी ने अपनी पत्रिकाओं के बारे में संक्षेप में बताया। आर एन आई पंजीयन दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क डाक पंजीयन और परेशान से जुड़ी जिज्ञासाएं और समाधान एवं अर्थ के बिना सब व्यर्थ विषय पर मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे ने प्रेस सेवा पोर्टल पर अपनी प्रोफाइल बनाने से लेकर आगे की कार्यवाही तक छोटी से छोटी जानकारी बिंदुवार साझा की। इसके बाद फिर से एक सत्र पत्रकार एवं संपादक बंधुओं के लिए आयोजित हुआ क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में पत्र -पत्रिकाओं के संपादक उपस्थित थे और देश के कोने-कोने से पधारे सभी पत्रकार, संपादक बंधु-भगिनी मंच से अपने पत्र पत्रिकाओं के बारे में संक्षिप्त में अपनी बात लोगों तक पहुंचा सके इस हेतु हर व्यक्ति को समान अवसर मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति परिषद, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित 'वीणा की वाणी' के मंच से प्राप्त हुआ।
निरोगधाम पत्रिका के संपादक अशोक कुमार पांडे, डॉ स्वाति तिवारी, संचालक अमन व्यास एवं मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे उपस्थित रहे। सुश्री सोनी सुगंधा ने संपादक धर्म पर 'नमन मेरा शत-शत नमन है' गीत प्रस्तुत किया। तत्पश्चात कांता राय एवं सुनीता प्रकाश की लघुकथा वृत्त का विमोचन हुआ। साहित्य अकादमी जब भी किसी साहित्यिक अनुष्ठान को आयोजित करती है तो इस आयोजन में उपस्थित सबसे वरिष्ठ साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है। आज भी 'वीणा की वाणी' के मंच से सभी के आदरणीय वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी का सम्मान इस मंच पर हुआ।