इन दिनों साहित्य की गलियों में एक किताब काफी चर्चा में है। जिसके लेखक हैं अभिषेक कुमार यह उनकी पहली किताब है। प्रकाशक है शिवना प्रकाशन। किताब में लेखक ने अपनी बिटिया गुनगुन के जन्म से अब तक के समय को 27 संस्मरणों के रूप में इस किताब में बखूबी सजाया है, संस्मरणों की इस किताब का नाम है... "परवरिश.. एक नन्ही परी की"। चूँकि लेखक पुलिस में हैं वे अपनी जीविकोपार्जन हेतु मध्य प्रदेश पुलिस के सबसे निचले ओहदे में कार्य करते हैं। पुलिस की ईमानदार स्वच्छ छवि और सेवा का भाव लेखक की शख्सियत में खून की तरह दौड़ते हैं। पुस्तक में लेखक ने यदा-कदा गुजारिश, अपील, पाबंद, आमद जैसे पुलिसिया शब्दों का बखूबी प्रयोग किया है, जो लेखक की विभाग के प्रति सजकता, समाज के प्रति नैतिकता को दर्शाने के साथ-साथ पुस्तक में भी चार चांद लगाते हैं। पुस्तक की भाषा किसी लेखक जैसे चातुर्य से बोझित नहीं है जबकि शिशु मन में उपजी किलकारी सी सहज और मोहक है। पाठक जैसे-जैसे पढ़ते जाता है सहजता से इस किताब को आत्मसात करते चला जाता है। लेखक लिखते हैं कि कई बार जब उनका मन ना हो तब भी गुनगुन यानी अपनी बिटिया को छोड़कर अपने काम पर जाते हैं जो उनके कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है कि.. "अपनी बेटी की नन्ही मुस्कान में डूबे रहने से कौन पिता बाहर निकलना चाहता है मगर दुनियादारी में खफा आदमी निकलता है और इस बेशकीमती सुख से बाहर दुनियावी प्रपंच में खुद को खपाता है।" लेखक बिटिया गुनगुन के जन्म के समय उसके हुलिया का चित्रण करते हुए लिखते हैं..."उसके चेहरे का रंग अपनी मम्मी जैसा और नाक पापा जैसी है कपड़ों में लिपटी जरा सी झाँकती उँगलियाँ हूबहू पापा की उँगलियाँ थी।" पुस्तक में एक जगह लेखक लिखते हैं कि.." एक दिन शाम के वक्त पापा ने देखा वह पेट के बल लेटी और इसका एक हाथ नीचे दब गया अपने हाथ को निकालने के लिए वह संघर्ष कर रही थी। पापा के मन में विचार आया कि इसमें गुनगुन की मदद कर दें, पर पापा ने वक्त की नजाकत को समझते हुए मन को मजबूत किया और धैर्य की शरण में चले गए। उन्होंने गुनगुन को देखते रहने का रास्ता चुना। इस अप्रत्याशित घटना से गुनगुन परेशान हो रही थी और रोने भी लगी थी, फिर ना समझी में ही गुनगुन ने ऐसा जोर लगाया कि वह पलटी और सीधी हो गई उसका हाथ भी निकल गया था पापा ने यह देखा। यह उसके पहले संघर्ष की जीत थी, पहली जीत थी।" किताब में आगे लेखक प्यारी बिटिया गुनगुन की बदमासियों का संदर्भ लेते हुए लिखते हैं कि.. "गुनगुन को एक गीत भी प्यारा था जिसकी कुछ लाइनें उसे कंठस्थ थी वह रोज यह पापा को सुनाती कभी ना सुनाती तो पापा ही इसे सुनने की उससे गुजारिश करते गीत था चंदा ने पूछा तारों से तारों ने पूछा हजारों से.. सबसे प्यारा कौन है.. पापा.. मेरे पापा..। यह गीत गुनगुन की आवाज में आज भी पापा के कानों में जब-तब रस घोलता रहता है, लेकिन यहाँ गीत में एक छोटी सी बनावट की गई थी गुनगुन की ओर से जब गुनगुन पापा के साथ रहती तो सबसे प्यारे पापा ही होते लेकिन गीत मम्मी की मौजूदगी में सुनाया जाता तो गीत की आखिरी लाइन में आंशिक बदलाव हो जाता फिर गुनगुन गाती सबसे प्यारा कौन है.. पापा.. मेरे मम्मी पापा..।" गुनगुन की इन शरारतों के बीच गुनगुन का दूसरा जन्म दिन आ गया था जिसका सभी परिवारजनों को बेहद इंतजार था। गुनगुन के प्रथम जन्मदिन को कोरोना लील गया था। खैर समय बीता आज वह इंतजार खत्म हुआ.. "पापा ने अपनी बेटी को बड़ी देर तक निहारा उनके मन से एक लंबी आह निकली मेरी रानी बिटिया तुम्हें किसी राजा के महल में जन्मना था, ईश्वर ने जाने क्या सोचकर तुम्हें मेरी झोली में डाल दिया पापा ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया कि वह अपनी बेटी को संसाधन भले ही किसी राजा से कम दे पाएँ लेकिन प्रेम उसे किसी राजा की बेटी से अधिक ही देंगे..!" क्योंकि आज गुनगुन का जन्मदिन था तो केक तो होना ही था। तो केक भी था, केक को देखकर लेखक ने बताते हैं कि.. "केक का मतलब गुनगुन के शब्दकोष में किसी बड़े उत्सव से था।" अब गुनगुन बड़ी हो रही थी गुनगुन की मम्मी ने गुनगुन के पापा से यानी लेखक से गुनगुन के लिए स्कूल के इंतजाम की बात कही.. लेखक ना चाहते हुए भी गुनगुन की मम्मी से सहमत होते हुए लिखते हैं.. " ग्रहस्थ का संविधान अपनी सहधर्मिणी के विवेक पर आधारित होता है आपके अधिकारों पर कर्तव्य अधिक हावी हो जाते हैं जबकि संशोधन की कोई गुंजाइश नहीं रहती पुरुष को अपना जीवन इसी दायरे के भीतर व्यतीत करना पड़ता है, पापा इसे सहर्ष स्वीकारते भी हैं..।" इस तरह प्यारी बिटिया गुनगुन विद्यालय जाने को तैयार होती हैं। यह किताब यूँ तो एक लेखक जो एक पिता भी हैं ने अपनी बिटिया के लिए लिखा हैं फिर भी इस किताब में अनेकों पुट समाए हुए हैं। एक जगह प्रेमचंद की स्टाइल में लिखते हुए लेखक लिखते हैं.."हर विदाई मृत्यु का थोड़ा सा अनुभव कराती है और हर मिलन पुनर्जीवन का..।" इस किताब का एक कोना लेखक के अपने निजी दुख से भी भरा हुआ है जिसे अनदेखा करना बेमानी होगी इसमें लेखक लिखते हैं.." धीरे-धीरे कोरोना बीत गया नहीं बीतता तो यह शोक जो उसने पापा और गुनगुन के परिवार को बेजरूरी का दुख देकर चला गया है चारों तरफ जलती लाशों का वह मंजर कभी भूला नहीं जा सकता। यह दुख तो वही समझ सकता है जिन्होंने इस बीमारी में अपने चहेतों को खोया है।" बिटिया गुनगुन के पालन पोषण की जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए लेखक अपने पाठकों के मध्य एक बात रखते हैं कि.. "हर माता-पिता एक से होते हैं उनकी चिंता उनका त्याग और परिश्रम का मूल्य शब्दों से नहीं आँका जा सकता यह विलक्षण नहीं है की दूर कहीं होता हो यह सभी करते हैं इतनी ही जिम्मेदारी से.. यही हर माता-पिता का पुरुषार्थ है उनका धर्म है वे सभी अपने बच्चों का इतना ही ध्यान रखते हैं..।" आगे भी लेखक अभिभावकों को सलाह देते हैं कि.. "पापा सभी अभिभावकों को यह सलाह देते हैं कि जब बच्चे एक से दो वर्ष की उम्र में हो तो अपने व्यवहार पर बहुत ध्यान दें किसी भी बात पर उन्हें ना ना करें ना ही उन्हें ना कहने का अवसर दें जैसे अगर आपको उन्हें पानी पिलाना है तो यह ना कहें की लो बेटा पानी पियो बल्कि उनसे पूछे बेटा आपके लिए पानी ले आए हैं आप अभी पियेंगे या थोड़ी देर बाद में..। पहले वाक्य में बच्चों की ना कहने की संभावना प्रबल है जबकि इस बात को दूसरे वाक्य के तरीके से बोलने पर उनके ना कहने की संभावना कम हो जाती है..। पूरी किताब में लेखक ने जो अभिभावक और बच्चों की परवरिश तथा पति-पत्नी के मध्य के रिश्ते साथ ही साथ पारिवारिक रिश्तों का जो मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है सर्वदा सराहनीय है। वर्तमान समय में यह किताब हर बच्चे को और प्रत्येक अभिभावक को पढ़नी ही चाहिए। यह किताब उन नालायक बच्चों के लिए एक सौम्य जवाब है जो अपने माता-पिता की परवरिश पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हुए प्रश्न करते हैं कि हमारे लिए किया ही क्या है आपने ? यह किताब उन अभिभावकों के लिए भी है जो अपने बच्चों के खड़े किए गए सवालों के उत्तर ना दे सकने की स्थिति में जब स्वयं को खड़ा पाए तो.. अपने नालायक बच्चों के हाथों में यह कीमती किताब सौंप दें। यह किताब उन्हें पढ़नी चाहिए जिन्हें प्रकृति से प्रेम है, पक्षियों से प्रेम है, जिन्हें पेड़ों से फूलों से प्रेम है, उन्हें भी पढ़ना चाहिए जिन्हें गायों से, गाय के बछड़ों से, गुम हुए बचपन के आँगन से प्रेम है.. इस किताब में लेखक ने चिड़ियों का, फूलों का, कौआ, मौसम, आँगन, आँगन में लगे पारिजात आदि का मनोरम चित्रण किया है। यही प्राकृतिक दृश्य हमें पुनः प्रकृति के आँगन में ले जाकर बिठा देता है। यह किताब उन्हें भी पढ़ना चाहिए जिन्हें रेडियो से प्रेम है वर्तमान युग जो चल रहा है, ज़ेन जी युग है इसमें ना जाने क्या-क्या नवीन प्लेटफॉर्म आ गए हैं किंतु हमारे जमाने में जो आनंद रेडियो में क्रिकेट की कमेंट्री से लेकर मनमीत गाने सुनने तक का एकमात्र साथी रेडियो ही था। इस किताब में लेखक ने स्वयं को प्रकृति प्रेमी के साथ-साथ रेडियो प्रेमी भी बताया है और रेडियो का बखूबी जरूरी जिक्र भी किताब में किया है। यह किताब अभिभावक और बच्चों के रिश्तों के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों पर भी एक शोध पुस्तिका है। मैं एक पाठक की हैसियत से एक बार पुनः अपील करूँगा कि सभी बच्चों को और खासकर ऐसे अभिभावक जिनके बच्चे अभी छः माह से 12 वर्ष तक के हैं उन्हें यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। बिटिया गुनगुन और गुनगुन के प्यारे-प्यारे दोस्त चिया(चिड़िया) मन्नू(गाय) चुन्नू(गाय का बछड़ा), फूल, कौआ और आँगन के पारिजात को आशीष। -आशीष मोहन