मिथिलेश नंदनी शरण के रुप में अयोध्या को मिला नया 'परमहंस'...
स्वर्गीय महंत रामचंद्र दास परमहंस जी ,जिन्होंने अयोध्या को अपनी आत्मा की तरह संजोया
ओम प्रकाश सिंह/
अयोध्या निहाल है। राम की नगरी, जहाँ सदियों से भक्ति की सरयू बहती रही, जहाँ हर कण में प्रभु के चरणों की ध्वनि गूँजती रही, वह अयोध्या अब लंबे अरसे बाद एक नई आशा की किरण में नहा रही है। मंदिर निर्माण के बाद से जो कड़ी सुरक्षा की जंजीरें, विकास के नाम पर विध्वंस की आँधी और वीआईपी व्यवस्था की बंदिशों ने उसे जकड़ रखा था, उसमें अब हल्की-हल्की साँसें लौट रही हैं। जैसे कोई पुरानी, पीड़ित माँ अचानक अपने सपूत की आवाज सुनकर चौंक उठे।काश, स्वर्गीय महंत रामचंद्र दास परमहंस जी आज होते! वे, जिन्होंने अयोध्या को अपनी आत्मा की तरह संजोया, जिनकी नजर में यह नगरी केवल पत्थरों और ईंटों का ढेर नहीं, बल्कि राम की स्मृति, आध्यात्म की ज्योति और सनातन की अस्मिता थी। उनके होते तो शायद यह अंधाधुंध “विकास” नाम का अत्याचार न होता, यह लूट न होती, यह सांस्कृतिक हत्या न होती। लेकिन परमहंस जी चले गए, और अयोध्या अब भी भुगत रही थी... भुगत रही थी उस विकास की, जो घाटों को वेडिंग शूट का स्टेज बना रहा था, जो राम की नगरी को मॉल और होटलों की भीड़ में बदल रहा था।फिर हुआ एक चमत्कार।अयोध्या को फिर एक परमहंस मिल गया। हनुमत निवास पीठ के पूज्य आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण जी। पिछले चार-पाँच दिनों से अयोध्या का जनमानस निहाल है, मंत्रमुग्ध है।
दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में 3, 4 और 5 अप्रैल को आयोजित “अयोध्या पर्व” के मंच पर, जब “भविष्य की अयोध्या – शासन और समाज” विषय पर उनका उद्बोधन हुआ, तो मानो सरयू की लहरें दिल्ली तक गूँज उठीं।आचार्य जी ने पूरे दम, साहस और तर्क के साथ दिल्ली की छाती पर चढ़कर अयोध्या का सच बोल दिया। विकास के नाम पर हो रहे सांस्कृतिक विध्वंस की कलई खोल दी। उन्होंने कहा — “यह विकास नहीं, अयोध्या के साथ धोखा है। विकास के नाम पर इसकी आध्यात्मिक अस्मिता को कुचला जा रहा है। घाट, जो राम-सीता की स्मृतियों के साक्षी हैं, आज वेडिंग शूट के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। सरयू के किनारे प्रेम की कहानियाँ लिखी जानी चाहिएं, न कि फोटो सेशन की।”उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा — अयोध्या प्रभु राम की स्मृति से परिभाषित होती है, न कि केवल कंक्रीट और व्यावसायिक भौतिकता से।
अयोध्या सबकी है, लेकिन यह “राम की अयोध्या” होनी चाहिए, न कि केवल मंदिर-व्यवसाय की। भीड़भाड़, अंधाधुंध परियोजनाएँ और परंपरा का हनन — इन सब पर उन्होंने गहरी चिंता जताई और आधुनिकता व परंपरा के बीच सच्चा संतुलन बनाने की अपील की।उनके ५५ मिनट के उद्बोधन ने सभा को स्तब्ध कर दिया। चंपत राय जी और पूर्व सांसद लल्लू सिंह जी जैसे गणमान्य सामने बैठे थे, लेकिन सत्य की आवाज रुकी नहीं। अयोध्या के प्रमुख संत ने जो कहा, वह न केवल एक भाषण था, बल्कि राम की नगरी की आत्मा की पुकार थी — “अयोध्या को लूटने मत दो, उसे राम की तरह सरल, पवित्र और आध्यात्मिक बनाए रखो।”आज अयोध्या निहाल इसलिए है क्योंकि उसे लगा है कि अंधेरे में एक दीपक जल उठा है। एक आवाज उठी है जो विकास के नाम पर होने वाले सांस्कृतिक हत्याकांड को चुनौती दे रही है। आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण जी की यह पुकार शायद अयोध्या को उसकी असली पहचान लौटाने का प्रथम स्वर है।राम की नगरी फिर जाग रही है। और इस बार जागरण सांस्कृतिक है, आध्यात्मिक है, सत्य का है।



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