समीक्षक : बलजीत सिंह  

साहित्य के क्षेत्र में किसी नई विधा का आगमन , सपनों के संसार जैसा होता है । ऐसे में किसी साहित्यकार का उस विधा में काम करना...समझो अपने आप में गौरव की बात है । सिरसा (हरियाणा) के जाने-माने साहित्यकार एवं समीक्षक डॉ० ज्ञानप्रकाश ' पीयूष ' जी ने भी एक नई विधा पर काम किया है और इस नई विधा का नाम है-- जनिका । हाल ही में 'पीयूष' जी की एक जनिका-संग्रह प्रकाशित हुई है , जिसका नाम है -- महक रही शब्दगंधा  । इस जनिका-संग्रह में कुल -702 जनिकाएं हैं । जहां तक जनिका की बात है -- यह तीन पंक्तियों वाली एक काव्यात्मक विधा है ; जिसकी पहली पंक्ति में एक शब्द , दूसरी में दो शब्द तथा तीसरी में तीन शब्द होते हैं । इसमें पहली और दूसरी पंक्ति में रचनाकार को अपनी बात पूरी करती होती है और तीसरी पंक्ति को उनके अर्थ के साथ जोड़कर , विशिष्ट भाव प्रकट करना होता है ।

राजस्थान शिक्षा विभाग में प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त डॉ० ज्ञानप्रकाश ' पीयूष ' जी किसी परिचय के मोहताज नहीं है । हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में इनकी अब तक उन्नीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ; जिसमें एक क्षणिका-संग्रह , पांच लघुकविता-संग्रह , एक हाइकु-संग्रह , एक लघुकथा-संग्रह , एक दोहा-संग्रह , तीन कविता-संग्रह , एक बाल कविता-संग्रह , तीन समीक्षात्मक तथा दो संपादित पुस्तकें हैं । इसमें कोई दोराय नहीं कि इनके द्वारा रचित पुस्तक ' महक रही शब्दगंधा ' जनिका-संग्रह एक पठनीय पुस्तक हैं ; जिनमें समाज , संस्कार , प्रेम , भ्रष्टाचार , राजनीति, साहित्य , सादगी , ईमानदारी , दोस्ती , दुश्मनी एवं संगति इत्यादि अनेक विषयों पर वर्णन किया है । छह शब्दों वाली इस अनोखी विधा में , रोचकता के साथ शब्दों का तालमेल बनाना इतना आसान काम नहीं है । पुस्तक में शामिल कुछ जनिकाओं का वर्णन यहाँ अवश्य करना चाहूँगा :--- 


संतान  / प्यारी लगती  / जब सेवा करती

नशा   / बुरा है / स्वास्थ्य के लिए

मौन  / भाषा है  / समझदार लोगों की

पेड़  /  नहीं रखते  / फल अपने पास

संबंध  /  बिगड़ जाते  / अभद्र व्यवहार से

पखेरू  /  उड़ जाते  / पर निकलने पर

करिश्में  /  देखे बहुत  / जादूगरनी जिंदगी के

बिटिया  /  चिरैया- सी  / चहकती दिन भर

नदी   /  निर्मल रहती  / बहते रहने से

समस्या  /  हल होती  / सामना करने से

शर्त  /  मत लगाओ  / सफल होकर दिखाओ

संस्कृति  /  रक्षक है  / मानवीय मूल्यों की

यौवन  / आता है  / मेहमान की तरह

सज्जन  /  जलते नहीं  / अपने पड़ोसी से

शंख  /  बजता है  / फूंक मारने पर

किसी भी क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से काम करने पर सफलता अवश्य मिलती है । जहां तक साहित्य की बात है -- इसमें कलमकार की कलम रुकनी नहीं चाहिए । शब्दों का दायरा चाहे कम हो , मगर उनके भाव प्रभावशाली होने चाहिए । माना जनिका एक प्रभावशाली विधा है और इस विधा में डॉ० ज्ञानप्रकाश ' पीयूष ' जी पूरी तरह से निपुण हैं । इनके द्वारा रचित पुस्तक ' महक रही शब्दगंधा ' एक विशेष जनिका-संग्रह है । भाषा शैली की दृष्टि से पुस्तक काफी प्रभावशाली है । पुस्तक के शीर्षक में सार्थकता साफ झलक रही है । प्रत्येक जनिका में शब्दों का जादू पाठक को  प्रभावित अवश्य करता है । पुस्तक प्रकाशन के लिए 'पीयूष' जी के साथ जनिका विधा के जनक डॉ० जनकराज शर्मा भी बधाई के पात्र है ; जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में एक नए विधा का आगाज करके , अपना नाम रोशन किया है । अतः पुस्तक प्रकाशन के लिए दोनों महानुभावों को हार्दिक शुभकामनाएं ।

पुस्तक का नाम :-- महक रही शब्दगंधा  / कवि :-- डॉ० ज्ञानप्रकाश ' पीयूष '/ प्रकाशक  :--  आनंद कला मंच - भिवानी , प्रथम संस्करण :-- 2025 / पृष्ठ :-- 128 / पुस्तक मूल्य :- 300 रुपए