समीक्षक : डा. अमिता चौधरी, मुम्बई 

आत्म मंथन का साक्षात आह्वान करती लोकप्रिय रचनाकार व कवयित्री श्रीमती रीता श्रीवास्तव जी अपने नवीनतम प्रकाशित काव्य संग्रह ‘ऋतज‘ के द्वारा पाठकों के ह्रदय को आंदोलित कर रही हैं । इनमें प्रकाशित कविताएँ न केवल हमारे ह्रदयों को स्पर्श करती हैं वरन् संवेदन शील प्रकृति के हर सोपान से एक दार्शनिक अनुभूति की झलक दिखला देती हैं ।

      सूर्य देव की उपासना से कृति का आरंभ है जिससे समस्त चराचर जगत में ‘ऊर्जा का संसार‘ रचने की प्रार्थना का आह्वान है , प्राण दायिनी उषा ही सृष्टि का मानो सुरम्यतम रूप है ।

      इस संग्रह में कवयित्री की 134 काव्य रचनाएं सृष्टि के विभिन्न रूप है , कहीं कलरव करते पक्षी , गुंजन करते भँवरे ,’चंद्लला‘ की चंद्रिका अँधेरों को चीरती हुई प्राणि जगत  को  प्रकाश की ओर धकेलती प्रतीत होती है । विषय वैविध्य के साथ ये कविताएँ हमारी अक्षुण्ण संस्कृति से सुरभित हैं । प्रकृति स्थान-स्थान पर माध्यम है हमारे  शाश्वत मूल्यों की धरोहर को सुरक्षित रखने का ।

कविता की भूमिका लिखते हुए वरिष्ठ योग व दर्शन लेखक श्री विद्यासागर वर्मा , पूर्व राजदूत  स्पष्ट कहते हैं कि , “ विदुषी रीता बहन ने समग्रता से जीवन को जिया है और ईश्वरीय ‘ ऋत सत्य’ की व्यवस्था का पालन किया है । “

आध्यात्मिक दृष्टिकोण को लेकर चलती हुई कवयित्री अहंकार में दिव्यता पाने का प्रयास करती है।

          ‘ नदी का पत्थर सहता सहता -…….

            घिसते घिसते छोटा होता 

             गोल गोल या वृत्ताकार 

             शालिग्राम का लें आकार । ‘

    श्री विद्या सागर वर्मा जी का स्पष्ट कथन है कि ‘ऋतज‘ में कवयित्री रीता श्रीवास्तव अपनी कविताओं के माध्यम से आत्मा की विद्यमानता और अमरता को दर्शा कर वैदिक दर्शन की सत्यता को रेखांकित करती हैं ।             

 ‘ बचा लो अपने सनातन आचरण को , 

     मेरी सभ्यता का आवरण महान है 

             त्राहिमाम त्राहिमाम…………’

    रीता जी की कविताएँ मधुर भावों सें लबालब हैं । पितृ स्मृति के अक्षुण्ण क्षण ‘ जहाँ पिता की स्मृति को नमन करते हैं , वहीं रीता जी नैसर्गिक सुषमा के मनोहारी वर्णन में  कविवर पंत व प्रसाद की छायावादी परंपरा को अपनाती प्रतीत होती हैं -

            ‘खग वृंद उड़े नीले नभ में , 

             लहरों के आँचल फहर उठे ,

             उन्मीलित नयनों से पल्लव 

              पुलक उठे तरु डोल उठे ‘

    भाषा की दृष्टि से काव्य सौष्ठव को दर्शाते हुए आपकी भाषा उच्च कोटि की साहित्यिक व लाक्षणिक है । प्रकृति चित्रण में आलम्बन व उद्दीपन दोनों विधाओं का प्रयोग प्रचुरता से प्राप्य है ।

     पथ का राही उदित होते सूर्य की अतुलनीय सुषमा से प्रभावित होते हुए कहता है —

          ‘ ठहर सको तो और ठहरो सूर्य ओ !

             या उदित हो डूबकर फिर से 

               त्वरित हो स्वस्ति कारक । ‘                

आपके संग्रह में कविताओं में विविधता है । 

कभी आकाशचारी तिलंगी ( पतंग ) पर उनका काव्य सौंदर्य बिखरा है , कभी सांस्कृतिक परंपराओं और पर्वों जैंसे रक्षाबंधन , चैती, होली ,फाल्गुन और बसंत के उत्सव हमारी मान्यताओं को सुमधुर बना रहे हैं । ’अकाल’ जैसी विपदा में लाक्षणिक भाव स्पष्ट दृष्टि गोचर हैं । वृद्धा कुम्हारिन की झुर्रियाँ अनुभव की मानो वीथिकायें हैं  -

 ‘ भाव संतोष का ले अमूल्य धन ,सब जग विस्मित करती हैं । ‘

    उसी प्रकार ‘सूरज मुखी ‘का वर्णन पाठक को अचम्भित कर देता है जब -

‘पीली पगिया से ढके हुए काले केशों को ,       

जैसे जगमग स्वर्ण शिखर , 

अपराजित से खड़े हुए तुम ,

सेनापति से रहे निखर ‘

 क्या अद्भुत कल्पना है !

 पुस्तक की शुभाशंसा में प्रसिद्ध लेखिका उषा किरन शुक्ला जी लिखती हैं -

 यह अपनी तरह का अनूठा और अद्यतन विचारों से समादृत लेखन है ।

 रीता जी की रचनाएं सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पारिवारिक संस्कृति ‘ ऋत’ से उत्पन्न सुन्दर मनोभावों का प्रस्फुटन है । साथ में प्रत्येक कविता से संबंधित अंकित विभिन्न मन लुभावने चित्र भी .अंकित हैं जो उनके उद्दीप्त भावों को उजागर करने में सहायक हैं । 

प्रकाशक : पाखी प्रकाशन ,साहिबाबाद ( उत्तर प्रदेश) , मूल्य : 250 /-