समय की करघे पर बुनी एक ज़िन्दगी


रपट : मुज़फ्फर अंसारी ,’कल्ले भाई’,चंदेरी 

चंदेरी की संकरी गलियों में चलते हुए जब किसी पुराने घर से हाथकरघे की खट-खट सुनाई देती है, तो ऐसा लगता है मानो सदियों पुरानी परंपरा आज भी साँस ले रही हो। इन्हीं ध्वनियों के बीच एक ऐसा करघा भी है, जिस पर बैठा एक बूढ़ा बुनकर अपनी पूरी ज़िन्दगी को धागों में बुनता चला आ रहा है। यह कहानी है चंदेरी के परंपरागत बुनकर अब्दुल अज़ीज़ पुत्र मीरा बख्श की।

आज उनकी आयु लगभग बानवे वर्ष है, लेकिन उनके हाथों की लय आज भी वैसी ही है जैसी तब थी, जब उन्होंने मात्र चौदह वर्ष की आयु में पहली बार करघे पर बैठना सीखा था। लगभग अठहत्तर वर्षों से उनका जीवन करघे की आवाज़ के साथ बीता है। उनके लिए करघा केवल रोज़गार नहीं, बल्कि जीवन का साथी, संघर्ष का सहयात्री और आत्मसम्मान का आधार रहा है।

अब्दुल अज़ीज़ साहब ने चंदेरी हाथकरघा उद्योग के स्वर्णिम दिन भी देखे हैं और उसके सबसे कठिन दौर भी। उन्होंने वह समय देखा, जब चंदेरी की महीन साड़ियाँ राजघरानों की शान हुआ करती थीं। फिर वह दौर भी आया, जब देश का विभाजन हुआ, रियासतों का अंत हुआ और शाही संरक्षण समाप्त होने लगा। चंदेरी के बुनकरों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। करघे चलते रहे, लेकिन खरीदार कम होते गए। मेहनत वही रही, पर मेहनताना घटता चला गया। 

अब्दुल अज़ीज़ पुत्र मीरा बख्श समय की करघे पर बुनी एक ज़िन्दगी

चंदेरी की संकरी गलियों में चलते हुए जब किसी पुराने घर से हाथकरघे की खट-खट सुनाई देती है, तो ऐसा लगता है मानो सदियों पुरानी परंपरा आज भी साँस ले रही हो। इन्हीं ध्वनियों के बीच एक ऐसा करघा भी है, जिस पर बैठा एक बूढ़ा बुनकर अपनी पूरी ज़िन्दगी को धागों में बुनता चला आ रहा है। यह कहानी है चंदेरी के परंपरागत बुनकर अब्दुल अज़ीज़ पुत्र मीरा बख्श की।

आज उनकी आयु लगभग बानवे वर्ष है, लेकिन उनके हाथों की लय आज भी वैसी ही है जैसी तब थी, जब उन्होंने मात्र चौदह वर्ष की आयु में पहली बार करघे पर बैठना सीखा था। लगभग अठहत्तर वर्षों से उनका जीवन करघे की आवाज़ के साथ बीता है। उनके लिए करघा केवल रोज़गार नहीं, बल्कि जीवन का साथी, संघर्ष का सहयात्री और आत्मसम्मान का आधार रहा है।

अब्दुल अज़ीज़ साहब ने चंदेरी हाथकरघा उद्योग के स्वर्णिम दिन भी देखे हैं और उसके सबसे कठिन दौर भी। उन्होंने वह समय देखा, जब चंदेरी की महीन साड़ियाँ राजघरानों की शान हुआ करती थीं। फिर वह दौर भी आया, जब देश का विभाजन हुआ, रियासतों का अंत हुआ और शाही संरक्षण समाप्त होने लगा। चंदेरी के बुनकरों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। करघे चलते रहे, लेकिन खरीदार कम होते गए। मेहनत वही रही, पर मेहनताना घटता चला गया।

वे उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कई परिवारों ने भूखे रहकर दिन काटे। जंगलों से फल, फूल और पत्तियाँ लाकर पेट भरना पड़ा। कभी सूखे ने जीवन को कठिन बनाया तो कभी लगातार वर्षा ने काम रोक दिया। बेरोज़गारी ने अनेक परिवारों को तोड़ दिया। उन कठिन वर्षों में भी उन्होंने अपना पुश्तैनी पेशा नहीं छोड़ा। जहाँ काम मिला, वहाँ जाकर बुनकरी की। दिन-रात मेहनत की और अपने परिवार का पालन-पोषण किया।

समय बीतता गया। बच्चे बड़े हुए, उनकी शादियाँ हुईं और वे अपने-अपने परिवारों में बस गए। जीवनसंगिनी ने साथ छोड़ा, फिर बहू भी इस दुनिया से चली गई। अब्दुल अज़ीज़ साहब अब अकेले हैं, पर स्वयं को कभी अकेला महसूस नहीं होने देते। कभी बेटे के घर चले जाते हैं, कभी बेटियों के यहाँ। जहाँ मन होता है, वहीं भोजन कर लेते हैं। और जब मन करता है, तो अपने बूढ़े लेकिन अब भी मज़बूत हाथों से स्वयं खाना बनाकर खा लेते हैं। उन्हें देखकर सहज ही विश्वास हो जाता है कि बुढ़ापा केवल शरीर पर आता है, मन पर नहीं।

आज भी वे बिना चश्मे के करघे पर बैठकर चंदेरी साड़ी बुनते हैं। महीन धागों पर उनकी पकड़ देखकर युवा बुनकर भी आश्चर्य करते हैं। डॉक्टर उन्हें आराम करने की सलाह देते हैं, लेकिन वे मुस्कराकर कहते हैं.शरीर को बूढ़ा होने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन आदमी को दिमाग़ से कभी बूढ़ा नहीं होना चाहिए। जब तक हाथ-पैर साथ दे रहे हैं, तब तक काम करते रहना चाहिए।” उनकी यह बात केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरे जीवन का सार है।

आज भी वे सप्ताह में लगभग आठ सौ से एक हज़ार रुपये तक कमा लेते हैं। यह आय भले ही अधिक न हो, पर उनके लिए यह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की कमाई है। उन्हें यह संतोष है कि जीवन भर उन्होंने मेहनत की रोटी खाई है। अब्दुल अज़ीज़ साहब का परिवार डिजिटल एम्पावरमेंट फ़ाउंडेशन (DEF) और चन्देरियाँ से भी जुड़ा रहा है। संस्था द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों से उनके परिवार को लाभ मिला। उनके एक पोते ने DEF के माध्यम से सिलाई का प्रशिक्षण प्राप्त किया और आज उसी हुनर से अपना जीवनयापन कर रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि परंपरा के साथ आधुनिक प्रशिक्षण जुड़ जाए, तो नई पीढ़ी के लिए नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

अब्दुल अज़ीज़ साहब को देखकर लगता है कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि चंदेरी के जीवित इतिहास का एक अध्याय हैं। उनके चेहरे की झुर्रियों में संघर्ष की इबारत लिखी है, उनके हाथों की नसों में वर्षों की मेहनत बहती है और उनकी आँखों में आज भी भविष्य के प्रति विश्वास दिखाई देता है। चंदेरी आने वाला हर शोधार्थी, हर बुनकर और हर कला-प्रेमी यदि उनके साथ कुछ समय बिताए, तो उसे पुस्तकों से अधिक जीवन का ज्ञान मिलेगा। उनके अनुभव आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर हैं। ऐसे लोगों के रहते हुए ही चंदेरी की परंपरा जीवित है।