पुस्तक समीक्षा

                   मोहित शर्मा                   

यात्रा मनुष्य को केवल नए स्थानों तक नहीं ले जाती, बल्कि उसकी दृष्टि को भी विस्तार देती है। किसी देश को देखना और उसे महसूस करना दो अलग अनुभव हैं। माला वर्मा का यात्रा-संस्मरण ‘न्यूज़ीलैंड’ इसी अनुभूति का दस्तावेज है। यह पुस्तक केवल न्यूज़ीलैंड के दर्शनीय स्थलों का विवरण नहीं देती, बल्कि वहाँ की प्रकृति, संस्कृति, इतिहास, व्यवस्था और लोगों के बीच से गुजरती हुई लेखिका के निजी अनुभवों को भी हमारे सामने रखती है। इसीलिए पुस्तक पढ़ते हुए लगता है कि हम किसी यात्रा-विवरण को नहीं, बल्कि एक जीवंत यात्रा को पढ़ रहे हैं।

न्यूज़ीलैंड की यह यात्रा लेखिका के लिए लंबे समय से संजोए हुए एक सपने का पूरा होना है। लगभग पच्चीस वर्षों से उनके मन में इस देश को देखने की इच्छा थी। फिल्म ‘कहो न प्यार है’ में दिखाई गई न्यूज़ीलैंड की प्राकृतिक सुंदरता ने इस आकर्षण को और गहरा किया था। आखिरकार, नवंबर 2025 में यह सपना पूरा हुआ। इसीलिए पुस्तक के आरंभ से ही यात्रा में एक विशेष उत्साह, प्रतीक्षा और भावनात्मक जुड़ाव दिखाई देता है। 

माला वर्मा की लेखन-शैली इस पुस्तक को विशेष बनाती है। उनकी भाषा सहज, बातचीत के करीब और आत्मीय है। वे अपने अनुभवों को किसी बनावटी साहित्यिक भाषा में प्रस्तुत नहीं करतीं। ऐसा लगता है जैसे लेखिका हमारे सामने बैठी हों और यात्रा के दौरान घटे प्रसंगों को उसी तरह सुना रही हों, जैसे किसी अपने को सुनाया जाता है। कहीं हल्का हास्य है, कहीं चुटीला व्यंग्य, कहीं विस्मय और कहीं आत्मीय स्मृति। सहयात्रियों के साथ हुई बातचीत और छोटे-छोटे प्रसंग यात्रा में मानवीय गर्माहट भर देते हैं। यही कारण है कि पाठक स्वयं को इस यात्रा का हिस्सा महसूस करने लगता है।

इस पुस्तक का सबसे मोहक पक्ष है न्यूज़ीलैंड की प्रकृति का अनुभवात्मक चित्रण। लेक टेकापो, माउंट कुक, क्वीनस्टाउन, मिलफोर्ड साउंड, फ्रांज जोसेफ, क्राइस्टचर्च, ऑकलैंड और रोटोरुआ जैसे स्थानों से गुजरते हुए प्रकृति लगातार अपना नया रूप खोलती जाती है। कहीं बर्फ से ढके पहाड़ हैं, कहीं पहाड़ों से उतरते झरने, कहीं शांत और निर्मल झीलें, तो कहीं रंग-बिरंगे फूलों से सजी धरती। लेखिका की दृष्टि केवल विशाल और प्रसिद्ध दृश्यों पर नहीं ठहरती; वे रास्ते में दिखाई देने वाले छोटे फूलों, पक्षियों और पानी की धाराओं को भी उतनी ही आत्मीयता से देखती हैं। 

उनके प्रकृति-वर्णन में केवल सौंदर्य-बोध नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदना भी है। कठिन परिस्थितियों में भी खिलते फूलों को देखकर लेखिका के मन में जीवन के प्रति एक सकारात्मक भाव पैदा होता है। बर्फ, ठंड और कठोर परिस्थितियों के बीच भी प्रकृति का अपना रंग बनाए रखना उन्हें भीतर तक प्रभावित करता है। इसीलिए उनके लिए न्यूज़ीलैंड की सुंदरता केवल आँखों को सुख देने वाली सुंदरता नहीं, बल्कि मन को छू लेने वाला अनुभव बन जाती है। 

प्रकृति के साथ पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष है स्वच्छता और पर्यावरण-संरक्षण। न्यूज़ीलैंड में लागू कठोर नियम लेखिका को कई बार आश्चर्य में डालते हैं। भोजन, सामान और जूतों की स्वच्छता तक को लेकर वहाँ जो सावधानी बरती जाती है, उसे देखकर वे अपने देश की परिस्थितियों के बारे में सोचने लगती हैं। इन प्रसंगों में लेखिका का स्वर कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक अवश्य होता है, लेकिन उसके भीतर चिंता और आत्ममंथन भी है। वह सवाल करती हैं कि जिस धरती पर हम रहते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी क्या है? 

यही वह बिंदु है जहाँ यह पुस्तक महज पर्यटन-वृत्तांत से ऊपर उठती है। दूसरे देश की अच्छाइयों को देखकर अपने समाज के बारे में सोचना यात्रा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेखिका न्यूज़ीलैंड के अनुशासन और व्यवस्था से प्रभावित होती हैं, लेकिन आँख मूँदकर उसकी प्रशंसा नहीं करतीं। वे तुलना करती हैं, सवाल करती हैं और पाठक को भी सोचने के लिए छोड़ देती हैं। इस तरह यात्रा बाहरी दुनिया से शुरू होकर भीतर के आत्ममंथन तक पहुँचती है।

पुस्तक में न्यूज़ीलैंड की माओरी संस्कृति को जानने की लेखिका की उत्सुकता भी उल्लेखनीय है। आधुनिकता के बीच जीवित प्राचीन संस्कृति, माओरी कला, नक्काशी और स्थानीय परंपराएँ न्यूज़ीलैंड की पहचान का अलग आयाम सामने लाती हैं। रोटोरुआ और ते पुइया के प्रसंगों में उबलते कीचड़ के कुंडों और भू-तापीय धरती के साथ माओरी संस्कृति का परिचय यात्रा को और गहराई देता है। इससे पाठक समझ पाता है कि किसी देश की सुंदरता केवल उसके प्राकृतिक दृश्यों में नहीं होती, उसकी संस्कृति भी उसकी आत्मा होती है। 

इसी तरह लेखिका की इतिहास में रुचि भी यात्रा को अर्थपूर्ण बनाती है। वे किसी स्थान को केवल वर्तमान के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उसके पीछे की कहानी तक जाने का प्रयास करती हैं। क्वीनस्टाउन के इतिहास में सोने की खोज से जुड़े प्रसंग हों या ऑकलैंड में पुराने ढाँचों को नए उपयोग में लाने की कहानी—इन सबके माध्यम से यात्रा का वर्तमान अपने अतीत से जुड़ता चलता है। 

इस यात्रा में केवल सुंदर दृश्य और रोमांच नहीं है। यात्रा की तैयारी, पासपोर्ट और वीज़ा, सामान, भोजन, दवाइयाँ, एयरपोर्ट के नियम और सहयात्रियों के साथ तालमेल जैसे छोटे-छोटे प्रसंग भी हैं। यही बातें पुस्तक को वास्तविक बनाती हैं। यात्रा किसी पोस्टकार्ड की तरह एकदम सुंदर और व्यवस्थित नहीं होती; उसमें असुविधाएँ, सावधानियाँ, इंतजार और अनिश्चितताएँ भी होती हैं। लेखिका इन सबको सहजता से दर्ज करती हैं और इसीलिए पाठक उनके अनुभव पर विश्वास कर पाता है। 

कुल मिलाकर, ‘न्यूज़ीलैंड’ एक देश की यात्रा से कहीं अधिक, एक संवेदनशील मन की यात्रा है। माला वर्मा ने न्यूज़ीलैंड को केवल देखा नहीं, उसे अपने अनुभवों में उतारा है। उनकी आँखों से देखे गए पहाड़, झीलें, फूल और शहर पाठक की आँखों के सामने भी आकार लेने लगते हैं। उनके साथ चलते हुए हम प्रकृति की सुंदरता देखते हैं, संस्कृति को समझते हैं, व्यवस्था पर विचार करते हैं और अपने ही जीवन की कुछ आदतों पर प्रश्न करने लगते हैं।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता यही है कि यात्रा समाप्त होने के बाद भी उसका असर समाप्त नहीं होता। पन्ने बंद करने के बाद भी बर्फ से ढके पहाड़, निर्मल झीलें, रंग-बिरंगे फूल, माओरी संस्कृति और लेखिका की सहज आवाज़ मन में बनी रहती है। लगता है, जैसे हम सचमुच उस यात्रा से होकर लौटे हों—कुछ दृश्य आँखों में, कुछ स्मृतियाँ मन में और कुछ प्रश्न अपने साथ लेकर।

‘न्यूज़ीलैंड’ इसलिए एक पठनीय यात्रा-संस्मरण है कि यह हमें केवल एक खूबसूरत देश की सैर नहीं कराता, बल्कि देखने, महसूस करने और अपने अनुभवों से सीखने की दृष्टि भी देता है। माला वर्मा की यह यात्रा पाठक को आमंत्रित करती है कि वह भी कुछ देर अपने परिचित संसार से बाहर निकले और दुनिया को एक नए यात्री की आँखों से देखे।

सहायक प्रबंधक / अंजनी प्रकाशन