समीक्षक : डा. अमिता चौधरी 

कुमकुम चर्तुर्वेदी जी का नवीनतम कथा संग्रह 'उठो अहिल्या '  हिमाचल के कुल्लू में पढ़ा । काफी दिनों से कोशिश कर रहे थे । पर सच है , ईश्वर हर चीज का समय निर्धारित कर के रखते हैं । मुंबई में पुस्तक पल-पल मेरे साथ रही , कभी सिरहाने , कभी सुबह उठते ही अखबार के साथ । और अब गुलमर्ग , पहलगाम , श्रीनगर होते हुये कुल्लू आ पहुँची । डोलती रही वह मेरे साथ अमूल्य निधि के समान , क्योंकि कुमकुम जी के लेखन से हम भली-भांति परिचित हैं । उनकी रचनायें यूं ही पन्ने पलटते हुये सरसरी निगाह से देखने वाली नहीं होतीं हैं । आपको उन्हें पढ़ना होता है , समझ-समझ के । उनका हर एक वाक्य , संवाद , पात्र बहुत कुछ कह कर जाता है , जिसे यदि आपने अनदेखा किया तो शायद आप रचना का मर्म नहीं समझ पायेंगे । अद्भुत तारतम्यता लिये हुये होती हैं उनकी रचना । जरा सा भी आपने मन भटकाया , तो पतंग के समान वे कब आपके हाथ से निकल जायेंगीं , आपको पता भी नहीं चलेगा । 

               पिछले करीब पचास साल से आजतक की सामाजिक व्यवस्था का लेखा-जोखा । इनकी विशेषता यही है कि ये पुरातन से ले कर आधुनिक , आज तक के काल को जोड़ कर  , हर खंड की सामाजिक , पारिवारिक व्यवस्थाओं , परस्पर पारिवारिक सम्बन्धों में हुये बदलाव , एक ही परिवार की विभिन्न पीढ़ियों में हो रहे भाषाई बदलाव , रहन-सहन , विस्थापन इन सभी को जोड़ते  हुये , एक मंजी हुई कथाशिल्पी के समान सृजन करती चली जा रहीं हैं ।

                 कुमकुम जी एक मंजे हुये कलाकार के समान , धैर्य के साथ कहानियां बुनती हैं । टेपिस्ट्री के समान , एक-एक पात्र एक के बाद एक जुड़ते चले जाते हैं और अपना-अपना किरदार निभाते चले जाते हैं , और अचानक उभरती है एक सुंदर सी कृति जिसे आप देखते ही रह जाते हैं , पढ़ते जाते हैं या यूं कहिये गुनते चले जाते हैं । कई-कई बार पढ़ने को मजबूर करती हैं आपकी रचनायें । एक-एक शब्द , एक-एक वाक्य आपके मन में कब और कैसे बसता चला जाता है , आपको मालूम भी नहीं पड़ पाता है । उनकी कहानियों में महिलाओं की मनःस्थिति एक अलग ही लेवेल की होती है । हर कहानी में सारी महिलायें अपने-अपने परिवार में , रिश्तों में गुंधी हुई दिखती हैं , निभातीं हैं वे अपनी सारी जिम्मेदारियां । 

            कुल्लू की सुरम्य वादियों में चारों ओर   ऊँची-ऊँची पहाड़ियां , फलों के बगीचों के बीच , शहर के कोलाहल से दूर , शान्त  गेस्टहाउस में जब आज यह किताब पढ़ी , तो इन सारी महिला पात्रों तथा अडिग खड़ी पहाड़ियों में एक अजब सी साम्यता दिखाई दी । भले ही पहली नजर में आपको ये महिलायें कुछ अशक्त सी दिखें , पर अन्दर से वे सब इन पहाड़ियों के समान अडिग तथा स्वाभिमानी निकलीं । सिर्फ महिलायें ही नहीं , पूरे मानव जाति के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ है कुमकुम जी को ।

               किसी भी पात्र के संवाद से आप उनकी उम्र , परिवेश का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं । कई पीढ़ियों को एक साथ ले कर चलना , कहानी गढ़ते जाना , तारतम्यता बनाये रखना आपकी विशेषता है ।

        ' खूंटी पर टंगा कुर्ता ' आप पढ़ेंगे , तो आप पायेंगे कि चार पीढ़ियां एक साथ चल रहीं हैं । इस कहानी की चुलबुली , गदबदी अम्मा मेरी मनपसंद पात्र निकली , अप्रत्याशित तरीके से । पर इस कहानी में सभी पात्र सतही तौर से देखने में जैसे भी लगें , पर अन्त तक पहुंचते-पहुंचते आप पायेंगे कि वे सब नियति-चक्र में बँधे हुये थे और अपनी जगह सभी सही थे ।

            ‘ सर्द रातों के बाद निकली धूप ‘ एक  पारिवारिक कहानी है , जिसमें कई सदस्य एक के बाद एक जुड़ते चले जाते हैं । कहानी के सारे पात्रों की मनःस्थिति लेखिका ने कथावस्तु के हिसाब विस्तृत इस प्रकार वर्णित की है कि पाठक उन सब से भावनात्मक स्तर पर जुड़ता चला जाता है । इस कहानी का मुख्य केंद्र परिवार की दो बहने हैं । इसमें कहानी में पारिवारिक संबंधों को बहुत गहराई से दर्शाया गया है । कहानी का मुख्य संदेश यही है कि परिवार में स्नेहिल वातावरण बनाए रखने के लिए एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना होनी चाहिए तथा सबके साथ सांमजस्य बैठा कर रखना चाहिये फिर चाहे कोई आपसे बड़ा हो या छोटा । बहनों का एक दूसरे के प्रति प्रेम बहुत ही सुंदर तरीके से दर्शाया गया है ।

                   इनकी कहानी 'सोने की चूड़ियां ' के बारे में पहले ही काफी सुना था । कोई इस कदर कैसे जान सकता है , किसी भी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के बारे में , किसी भी श्रेणी के बारे में,  किसी भी वर्ग के बारे में । इतने गहराई से समझना कि वे कैसे रहते हैं , पश्चिमी उत्तर प्रदेश , निम्न मध्यवर्गीय परिवार , पैसे की किल्लत , कोई सामाजिक भावनात्मक , व्यवहारिक , आर्थिक सहयोग नहीं । हमने तो नहीं देखा ऐसा रहन-सहन , शोषण । शिक्षा तथा आर्थिक कठिनाइयों से उपजी कठिन परिस्थितियां । समाज में ,आस-पास में कोई ताल-मेल नहीं ,कोई सहायक नहीं बुरे वक्त में । 

                  कैसे देखा , कैसे जाना लेखिका ने । क्या उन्होंने बहुत पास से देखा , समझा जाना । भाषा थी बिल्कुल भिन्न । इतनी तकलीफें उठानी पड़ती है , इतना संघर्ष होता है जीने में । एक सुसंस्कृत , पढ़े-लिखे परिवार की हैं कुमकुम जी । फिर कैसे , कब समझा यह सब । शायद यही कुशल रचनाकार की विशेषता होती है ।        

          उनका एक कहानी संग्रह ‘ मरहम ‘ पहले ही प्रकाशित हो चुका है । हिन्दी की सभी स्तरीय पत्रिकाओं में बरसों से इनकी रचनायें प्रकाशित होती आ रही हैं । पाठ्य पुस्तकों को लिखने का इन्हें दीर्घकालीन अनुभव है जैसे मेधा,सुमंगला, प्रज्ञापुंज तरंगिनी । अनेक कविताएं , कहानी प्रकाशित एवम्  पुरस्कृत , नाटकों का मंचन ।

              और पुस्तक के मुखपृष्ठ के तो कहना ही क्या , बिल्कुल सटीक , बहुत ही सुंदर । अब ये पुस्तक मेरी मित्र बन कर रहेगी जीवन-पर्यन्त । धन्यवाद कुमकुम जी , हिन्दी साहित्य जगत के लिये इतना सुंदर कथा संग्रह सृजित करने  के लिये ।