अब राजस्थान पर्यटन के आयोजनों के जरिए देश-विदेश के सैलानियों तक पहुंच रही इसकी 'धुन'

सोनल जैन / जयपुर

जयपुर, 13 सितंबर 2026 / राजस्थान पर्यटन के सांस्कृतिक आयोजनों में रावणहत्थे की धुन पर्यटकों को लोकसंस्कृति की उस परंपरा से जोड़ती है, जिसमें संगीत के साथ कहानी भी चलती है। हाथ में धनुष जैसा गज, सामने तारों वाला छोटा सा वाद्य और उसके साथ शुरू होती पाबूजी की गाथा। कहीं रामदेवजी के भजन सुनाई देते हैं तो कहीं लोकनायकों की कथाएं। कभी गांवों की रात में गूंजने वाला यह वाद्य अब पर्यटन आयोजनों में देश-विदेश के सैलानियों के सामने बज रहा है।  रावणहत्था राजस्थान का पारंपरिक तार वाद्य है। इसे गज से बजाया जाता है। पारंपरिक रूप में बांस की डंडी, नारियल के खोल और चमड़े का इस्तेमाल होता है। तारों पर घोड़े के बालों से बने गज को चलाने से ध्वनि निकलती है और गज में लगे घुंघरू उसमें लय जोड़ते हैं।

रावणहत्था बजता है, कथा खुलती जाती हैः-

इस वाद्य का सबसे प्रसिद्ध संबंध पाबूजी की फड़ से है। फड़ कपड़े पर बनी चित्रकथा है, जिसमें पाबूजी के जीवन, पराक्रम और उनसे जुड़ी लोक मान्यताओं के प्रसंग चित्रित होते हैं। फड़ के सामने भोपा रावणहत्था बजाते हुए पाबूजी की गाथा गाता है। गीत के साथ वह फड़ के चित्रों की ओर संकेत करता है और प्रसंग दर प्रसंग कथा आगे बढ़ती है। इस प्रस्तुति में चित्र, गायन और वादन एक साथ चलते हैं। यही रावणहत्थे की खास पहचान है यह धुन के साथ कथा भी सुनाता है।


भोपा-भोपी की परंपराः-

पाबूजी की फड़ की प्रस्तुति में भोपा रावणहत्था बजाता और गाथा गाता है, जबकि भोपी गायन में साथ देती है। पश्चिमी राजस्थान में कई कलाकार परिवार इस परंपरा को पीढ़ियों से आगे बढ़ाते रहे हैं। रावणहत्थे का इस्तेमाल केवल पाबूजी की गाथा तक सीमित नहीं है। लोक परंपरा में रामदेवजी की फड़ तथा लोकदेवताओं, लोकनायकों और विभिन्न लोकगीतों के गायन में भी इसकी धुन सुनाई देती है। इस तरह रावणहत्था राजस्थान की मौखिक कथागायन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

सादगी में छिपी अलग आवाजः-

रावणहत्थे की बनावट बेहद साधारण है, लेकिन इसकी आवाज अलग पहचान रखती है। तारों पर गज के चलने से पैदा होने वाला कंपन और उसके साथ बजते घुंघरू इसकी धुन को विशिष्ट बनाते हैं। पारंपरिक रावणहत्था स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से तैयार होता रहा है। बांस, नारियल का खोल, चमड़ा, तार और घोड़े के बाल इसके प्रमुख हिस्से हैं। कलाकारों ने समय के साथ इसकी धुनों के साथ प्रयोग भी किए हैं और पारंपरिक गाथाओं के अलावा नई धुनों को भी इसमें जगह दी है।

गांवों से पर्यटन आयोजनों तकः-

बदलते समय के साथ गांवों में रातभर चलने वाली लोकगाथाओं और पारंपरिक प्रस्तुतियों के अवसर कम हुए। इसका सीधा असर उन कलाकारों पर पड़ा जिनकी आजीविका इन प्रस्तुतियों से जुड़ी थी। ऐसे दौर में पर्यटन विभाग के आयोजनों ने कलाकारों के लिए प्रस्तुति के नए अवसर खोले। राजस्थान पर्यटन विभाग के मेलों, उत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां नियमित रूप से शामिल होती हैं। इनमें रावणहत्था भी अपनी विशिष्ट धुन के साथ पर्यटकों के सामने आता है।

पर्यटन स्थलों पर कलाकारों की प्रस्तुतियां केवल मनोरंजन नहीं रहतीं। पर्यटक वाद्य को करीब से देखते हैं, उसकी बनावट और बजाने की शैली के बारे में पूछते हैं और उससे जुड़ी लोककथा जानने में रुचि लेते हैं। इस तरह कलाकार को मंच और श्रोता दोनों मिलते हैं। उदयपुर और जयपुर सहित राजस्थान के पर्यटन केंद्रों पर रावणहत्था बनाने और बजाने वाले कलाकारों की प्रस्तुतियां पर्यटकों के आकर्षण का हिस्सा होती हैं। उनके लिए यह परंपरा कला के साथ आय का माध्यम भी बन रही है।

वाद्य नहीं, विरासत की आवाजः-

रावणहत्थे के साथ केवल संगीत नहीं चलता। उसके साथ कलाकार की पीढ़ियों की साधना, लोकगीत, कथाएं और प्रदर्शन की परंपरा जुड़ी है। इसलिए इसे जीवित रखने के लिए केवल वाद्य को सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं। वाद्य बजाने वाला कलाकार और उसे सुनने वाला श्रोता—दोनों जरूरी हैं। राजस्थान पर्यटन के मंच इस कड़ी को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। जब किसी पर्यटन आयोजन में रावणहत्थे की धुन सुनाई देती है, तो एक पुरानी लोक परंपरा नए दर्शकों के सामने जीवंत हो उठती है। रावणहत्थे के तार पुराने हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी नई है। और जब तक उसके तारों पर गज चलता रहेगा, राजस्थान की लोककथाओं का यह संगीत भी सुनाई देता रहेगा।