अध्यन कक्ष - प्रणाम पर्यटन - पहले पढ़ें, फिर घूमें

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अध्यन कक्ष

पुस्तक समीक्षा 


'काला पानी का सफ़ेद सच' 
मतलब घूमने -फिरने कि कथा
समीक्षक : प्रदीप श्रीवास्तव 
घूमना -फिरना किसे अच्छा नहीं लागत। हर व्यक्ति की इच्छा होती है वह अपने देश को देखे ,जाने और समझे। यही बात हरियाणा के हिसार के रहने वाले कवि लेखक बलजीत सिंह में कूट-कूट कर भरी दिखती है । जब भी उन्हें मौका मिलता है वह निकाल पड़ते हैं घूमने। कभी-कभी उनके साथ उनकी कवियत्री पत्नी राजबाला भी होती हैं। अगर यूं कहें दोनों ही घुमक्कड़ हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हाल ही में बलजीत सिंह की एक पुस्तक आई है "काला पानी  का सफ़ेद सच"

'काला पानी का सफ़ेद सच' , शीर्षक से तो लगता है की यह पुस्तक उनके अंडमान निकोबार की यात्रा का विवरण होगा। क्यों कि शीर्षक इतना अच है कि पाठक का मन बरबस पढ़ने को व्याकुल हो उठेगा। लेकिन अंडमान पर तो उनका यात्रा वृतांत तो है ही साथ ही देश के कई आँय भागों को भी इस पुसटक में समेटा है उन्हो ने । जिसमें जबलपुर का भेड़ाघाट हे तो साइन बाबा की तपोस्थली शिर्डी भी । भगवान शिव कि नागरी हरिद्वार हे तो मह काल की नागरी उज्जैन  भी। लेखक अपनी कलाम के माध्यम से अंडमान से कश्मीर तो वही दूसरी तरफ उत्तर भारत से सात बहनों वाले राज्य  के मेघालय की सैर तो कराते हैं ,साथ ही समय निकाल कर पड़ोसी देश नेपाल भी दिखाना नहीं भूलते। कुल मिलकर कहा सकते हैं कि यदि आप को पर्यटन का शौक है तो यह पुस्तक आप के लिए गागर में सागर वाली कहावत को चरितार्थ करती है । बलजीत सिंह के लिखने की शैली अपने आप मैं अनूठी है । उनके लिखे हुए को पढ़ना अपने आप में उस जगह के दृश्य को अपने मन में बैठने जैसा लगता है।
जब यह पुस्तक मेरे पास आई तो में ने सोचा कि यह अंडमान निकोबार का यात्रा वृतांत होगा। लेकिन जब पढ़ने बैठा तो पाया की यह तो पूरे भारत का दर्शन करा रही है। जिसमें यात्री लेखक ने बड़े ही सुंदर ढंग से शब्दों का चयन करते हुए एक सुंदर माला के रूप में पिरोया है। अगर आप घूमने जाना चाहते हैं तो  'काला पानी का सफ़ेद सच' को जरूर पड़ें । आप की सारी जिज्ञासा का समाधान करेगी।
पुस्तक : 'काला पानी का सफ़ेद सच' , लेखक : बलजीत सिंह ,प्रकाशक:रवीना प्रकाशन , दिल्ली । कीमत: 350/-


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करमजला : अनूठे तानो-बानो में बुनी कहानी 
महेश कुमार केशरी
गभग दो दशक पहले सन 2000 में शिरोमणि महतो जी का एक सामाजिक उपन्यास उपेक्षिता आया था, गांव की सामाजिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास था .आज दो - दशक के बाद उनका दूसरा उपन्यास करमजला आया है, ये उपन्यास भी सामाजिक -जीवन के बिंबों का सफल चित्रण है, उपन्यास का नायक है, राघव, और नायिका है विभा, उपन्यास के शुरुआत में स्कूल के दृश्य का चित्रण है, एक कमजोर समाज का लड़का कैसे अपनी कक्षा में प्रवेश करता है और मोहन नाम का लड़का राघव( नायक ) का विरोध करता है, लेकिन राघव का सर्मथन  नायिका ( विभा)करती है. नायिका के पिता माथुर सिन्हा और खुद नायक( राघव) में भी सामान्य मानवीय दुर्बलताएं  हैं, जिसे लेखक समय समय पर उपन्यास में चित्रित करते  चलता है  इसी की और कडियां हैं हरहरि सिंह  , रेशमा,  और दिवाकरन , दुलिया कामिन . नायिका ( विभा) के पिता माथुर सिन्हा विभा की मुंह बोली मौसी के साथ संसर्ग करते हैं, वहीं  राघव उपन्यास का नायक , पगली कलसी, रेशमा,  के साथ भी शारीरिक संसर्ग करता है .कोयलांचल में जहाँ, बाहरी ( बिहारियों) और लोकल ( झारखंडियों) के आपसी टकराव को चिन्हित किया गया है.वहीं, ये उपन्यास 1980  के दशक के आसपास के झारखंड और उसके आंदोलन को लेकर है, जिसके केन्द्र में, विनोद बिहारी महतो, और शिवा महतो हैं. एक प्रसंग में शिवा महतो कहते हैं -" कैसे लोगे झारखंड " ,  जबाब होता है," लडकर लेंगें झारखंड! "! राघव को विभा अक्सर पढने- लिखने और कुछ बडा़ बनने के लिए बार-बार प्रेरित करती रहती है. एक प्रसंग में नायक फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन से प्रभावित होकर फिल्मी दुनिया में जाना चाहता है, और हीरो बनना चाहता है. नायिका विभा राघव को हीरो बनने के लिए प्रोत्साहित करती है. फिर, राघव प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहता है. इसके लिए भी नायिका राघव को प्रोत्साहित करती है.
राघव और विभा का क्वार्टर अगल - बगल में है.दोनों एक ही कक्षा में पढते हैं . दोनों पढने में मेघावी  भी हैं. राघव विभा के घर पढने के लिए जाता है. इसी क्रम में उनके बीच प्रेम हो जाता है.इधर विभा की माँ का दमे की बीमारी के कारण देहांत हो जाता है. माथुर सिन्हा बेटी के सर से मां का साया उठ जाने से विभा को और भी प्रेम करने लगते हैं. इधर विभा, राघव से गर्भवती हो जाती है!
कहने की  जरूरत नहीं है कि समाज में बिन ब्याही मां का क्या स्थान होता है. राधव के पिता रघु महतो  बिहारियों के विरोधी हैं क्योंकि उनकी ममेरी बहन हरहरि सिंह से फंसी हुई है. हरहरि सिंह बिहारी है और वो कोयलांचल की कामिनों   का यौन- शोषण करता है. केवल हरहरि सिंह ही नहीं कोयलांचल के हर अमला -बाबू झारखंडियों के इज्जत- अस्मत लूटने के लिए लालायित है, कदाचित रघु महतो इसलिए भी बिहारियों से नफरत करते हैं.इधर विभा के पांव  भारी हो जाने के कारण माथुर सिन्हा विवश हो जाते हैं और रघु महतो से राघव और विभा के विवाह की बात करते हैं , यहाँ ये बताना जरूरी है कि माथुर सिन्हा बिहार के रहने वाले हैं.इसलिए भी रघु महतो, माथुर सिन्हा से नफरत करते हैं. रघु महतो, माथुर सिन्हा के प्रस्ताव को सिरे से नकार देते हैं.इस पर राघव, विभा से दिल्ली भाग चलने की बात कहता है, विभा, राघव के साथ  भागने से इंकार कर देती है. माथुर सिन्हा, रघु महतो के इंकार से टूट जाते हैं. बिचौलिए शंकर पांडे   (किराना वाले) माथुर सिन्हा के सामने भैरव सिंह का प्रस्ताव रखता है कि भैरव सिंह विभा से अपने बेटे की शादी करना चाहते हैं. आरंभ में माथुर सिन्हा विभा की राय जानने के बहाने  शंकर पांडे को टाल जाते हैं लेकिन कुछ समय के पश्चात विभा और भैरव सिंह के लड़के का विवाह संपन्न हो जाता है. इधर, विभा की शादी से दुखी होकर राघव जहर खा लेता है ,  लेकिन पडोस में रहने वाले, चाचा- चाची और पडौसियों की मदद से राघव को अस्पताल ले जाया जाता है जहाँ राघव को बचा लिया जाता है . कमलदेव( विभा के पति) को कुछ महीने बाद विभा के गर्भवती होने का पता चलता है. वो विभा से मारपीट भी करता है वो जानना चाहता है कि ये होने वाला बच्चा किसका है. विभा स्पष्ट तौर पर राघव का नाम घरलू पंचायत में ले लेती है.  घरेलू पंचायत में फैसला होता है कि विभा पैसे वाले बाप की बेटी है( इसलिए दुधारू गाय की लात भी सहनी पडती है) विभा  का गर्भपात करवा दिया जाए जिससे घर की इज्जत घर में ही  बनी रह जाए और यदि बाद में कमलदेव का मन करे तो वो एक शादी और कर ले! लेकिन, विभा गर्भपात करवाने से साफ इंकार कर देती है. और वो कमलदेव का घर छोड़कर वापस माथुर सिन्हा के पास आकर रहने लगती है. बाद में विभा के श्वशुर विभा के पिता के पास पच्चीस- हजार रूपये की मांग जमीन खरीदने के लिए करते हैं. भैरव सिंह बहू से होने वाली गलती ( गर्भवती होने) को ढकने की कीमत के तौर पर ये पच्चीस हजार रुपये मांगते हैं लेकिन, वे इस बात को साफ - साफ कहना नहीं चाहते, लेकिन विभा इसका आशय समझते हुए माथुर सिन्हा को पैसे देने के लिए मना कर देती है.भैरव सिंह अपनी दाल गलते न देखकर विभा और उसके पिता को खरी- खोटी और उल-जलूल बकते हुए चले जाते हैं.
महेश कुमार केशरी
इधर विभा का राघव के घर आना जाना जारी रहता है, लेकिन राघव विभा से एक निश्चित दूरी बनाकर रहता है.अब वो विभा से बिलकुल मिलता जुलता नहीं है. विभा की शादी के बाद वो  रघु महतो से सीधे मुंह बात भी नहीं करता है अब वो क्वार्टर में  भी नहीं  रहता  है .वो अब गांव में ही रहता है.  नंदनी देवी ( राघव की माँ) राघव और विभा के प्रेम से लेकर वियोग (विभा की शादी ) तक की बात को भलीभाँति जानती है . कुछ- कुछ राघव से सहानुभूति भी रखती है. लेकिन वो कर भी क्या सकती है, राघव के पिता रघु महतो विभा और राघव की शादी के खिलाफ हैं.कालांतर में रघु महतो को भी विभा और उसके होनेवाले बच्चे को लेकर चिंता होती है. उन्हें लगता है कि आखिर विभा के पेट में पलने वाला बच्चा भी उन्हीं का ही तो खून है ! उन्हें पश्चाताप होने लगता है.और आखिरी में वो विभा और उसके बच्चे को अपनाना चाहते हैं. लेकिन, राघव को इन बातों से कोई मतलब नहीं है. वो पगली कलसी से शारीरिक संबंध बनाता है. पगली - गंदी कलसी . लेकिन पगली कलसी में आदिम मादकता है जो क्षणभंगुर नहीं है वो बार- बार कलसी को भोगना चाहता है. कलसी पगली की आदिम मादकता राघव को वासनांध कर देती है. रेशमा, विभा और पगली कलसी के बीच की कड़ी है. उसके जिस्म की मादकता उन दोनों( विभा और पगली कलसी) से अलग है, और ज्यादा बेहतर है. लेखक ने गांव के सफेदपोश और व्यवसायी के गठजोड़ की ओर इशारा करते हुए रूपचंद महतो का जिक्र किया है, रुपचंद महतो ( व्यवसायी- कृषक) भी पगली कलसी के आदिम मादकता को खूब भोगते हैं,वो अधेड़ हैं पचास- पचपन साल के लेकिन दिखते चालीस साल के हैं गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं. कलसी को लोगों और युवाओं ने बूट( चना) और मिठाई देकर खूब भोगा है. गांव की बदनामी ना हो इससे बचने के लिए गांव की औरतें गांव की ही कुसराइन से दवा लेकर पगली कलसी का कई बार गर्भ भी गिरवा चुकीं हैं . गांव को बदनामी से बचाने के लिए! गांव में हो रही अनैतिकताओं की पोल लेखक ने बडी़ ही साफगोई से खोल दिया है! वहीं सत्ता को भी एक तरह से बेनकाब कर दिया है. पगली कलसी को गांव में किसी ने जहर दे दिया है. पगली कलसी मर गई है. लेकिन, रुपचंद महतो गांव के प्रतिष्ठित व्यवसायी भी हैं उनके मित्र गांव के विधायक हैं और रूपचंद महतो के अच्छे दोस्त भी हैं, इस कारण से मामला रफा- दफा हो जाता है! हांलाकि, पगली कलसी के नाम से राघव का नाम भी जुड जाता है.
1980  के दशक के समय ही  झारखंड में एक और आंदोलन चलाया जा रहा था .  देवा समाज . इस समाज का मुख्य उद्देश्य था शादी के बाद एक दूसरे को छोडने के रिवाज का सामाजिक विरोध करना इसको लेकर ही  और देवा समाज की स्थापना की गई थी ताकि शादी के बाद ना तो लडका, लड़की को छोड़ पाए और न ही लड़की, लडका को छोड़ पाए! रेशमा नारी उत्थान समिति की अध्यक्षा है,  वो दिवाकरन की प्रेमिका भी है.
राघव को उसके पिता रघु महतो समझाते हैं, कि विभा के पेट में पल रहा बच्चा आखिर उनका ही खून है , वो राघव को विभा को अपनाने के लिए कहते हैं लेकिन राघव पिता  की बात को टाल जाता है. और अचानक से रघु महतो की तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पडता है.वहाँ विभा श्वशुर रघु महतो की खूब सेवा- सुश्रूषा करती है और रघु महतो के साथ उनके पूरी तरह से ठीक होने तक साथ में ही रहती है. सास नंदनी देवी विभा के सेवा -व्यवहार से तृप्त हो जाती है और ये फैसला करती हैं कि वो विभा को अपने घर की बहू बनाएंगी. बाद में वो राघव से कहती हैं कि वो विभा को अपना ले नहीं तो वो विभा की शादी माधव  ( राघव के छोटे भाई) से कर देगी . राघव को अपने भाई को बलि का बकरा बनते देख राघव नंदनी देवी की बात मान लेता है और विभा से एक सादे समारोह में शादी कर लेता है. लेकिन राघव घर नहीं लौटता है वो रेशमा के पास चला जाता है.और उससे प्रेम संबंध बनाता है. वहां दिवाकरन कुछ अरसे बाद आकर रेशमा को राघव के शादी-शुदा होने की जानकारी देता है और रेशमा को भडकाता है तत्काल रेशमा राघव को भला- बुरा कहती है और उसे भगा देती है. फिर वो दिवाकरन को भी नारी उत्थान समिति की संयुक्त संयोजिकता  मंजुलता के साथ छेडखानी की बात को लेकर दुत्कारती  है . रेशमा दिवाकरन को नारी उत्थान समिति की बदनामी को लेकर कोसती है और दिवाकरन को भी वहां से चले जाने को कहती है.फिर उसे राघव से अपने किए गए  व्यवहार की गलती का एहसास होता है और वो  आत्मग्लानि  के कारण  राघव से माफी मांगती है. एक बार फिर से दिवाकरन रेशमा के पास आता है और रेशमा को भडकाना चाहता है, इसी बात पर राघव और दिवाकरन के बीच मारपीट हो जाती है और दिवाकरन को बेइज्जत करके रेशमा और राघव भगा देते हैं.इधर दिवाकरन को रेशमा और राघव का प्रेम खटकता है और वो गाँव वालों को भडकाता है . बाद में पंचायत तक की नौबत आ जाती है. पंचायत में राघव और रेशमा को लोग मारपीट और बेइज्जत करते हैं. इसका कारण ये होता है कि राधव और रेशमा के बीच मौसी और बेटे का संबंध होता है. लेकिन रात के अंधेरे में राघव और रेशमा रिश्तों की मर्यादा तोडते रहते है, जिससे बस्ती वालों को उनके असली रिश्ते की जानकारी मिलती है. अंततः दोनों को बेइज्जत होना पड़ता है.  इधर, विभा ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया है, नंदनी देवी पोती को पाकर खुश हैं. बहुत दिन के बाद उनके घर में बेटी आयी है वो बहुत ही ज्यादा खुश हैं. इधर, विभा की मुलाकात नर्सिंग होम में कपिल  नामक कंपाउंडर से होती है. कपिल कभी -कभी विभा के घर भी आता है, इंजेक्शन लगाने. विभा का जवान मन कपिल का स्पर्श पाकर गदगद हो जाता है. प्रारंभ में कपिल का घर आना -जाना नंदनी देवी को अच्छा नहीं लगता लेकिन, राघव को रेशमा के चुंगल से जब आजादी दिलवाने को लेकर वो अपना असफल  प्रयत्न करती है तब उन्हें भी विभा के नारी देह की  जरूरत का एहसास हो जाता है. प्रौढ़ मन कपिल- विभा के प्रेम की शुरुआती पेंगों को भांप लेता है. वो विभा और कपिल के सामने ये प्रस्ताव रखती हैं कि अगर वे दोनों चाहे तो आपस में विवाह कर सकते हैं. लेकिन, नंदनी देवी के इतने उदार व्यवहार से कपिल नंदनी देवी के पैरों में गिरकर हृदय से गदगद होकर माफी मांगता है और नंदनी देवी भी अकेली विभा पर तरस खाकर कपिल से अनुरोध करतीं हैं - कि कभी-कभी विभा से आकर मिलते रहो. विभा का मन लगा रहेगा . कपिल उनके अनुरोध को मान लेता है.इधर नंदनी देवी दिव्या के जन्म की खुशी में और राघव और विभा की शादी के उपलक्ष्य में गाँव में एक भोज  लाल भात (खस्सी का मीट और भात) का आयोजन करना चाहती हैं.  लेकिन पंचायत राघव के  बिरादरी के बाहर जाकर शादी करने के कारण  राघव और उसके परिवार का विरोध करता है और उसे अर्थदंड भी लगाता है करीब 15 सौ रूपये ! नंदनी देवी इसका पुरजोर विरोध करती  हैं . इघर समाज के लोगों से  प्रताडित होकर राघव जब अपने घर लौटा तो वो अपनी बेटी दिव्या को देखकर हृदय से गदगद हो गया. कुल मिलाकर करमजला उपन्यास एक बार पढने लायक है.
उपन्यास--करमजला , लेखक- शिरोमणि महतो , प्रकाशन- अनुज्ञा बुक्स , संस्करण -पेपरबैक , मूल्य-150 रू
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 पुस्तक समीक्षा 
ऐसी थी बेगम समरू
-जाहिद खान
बेगम समरू का सचभारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता राजगोपाल सिंह वर्मा की पहली किताब है। इस किताब को लेखक ने एक ऐतिहासिक किरदार बेगम समरू के इर्द-गिर्द बुना है। यह दरअसल, सरधना की मशहूर बेगम की जीवनकथा है, जिसने आधी सदी से ज्यादा समय यानी 58 साल तक सरधना की जागीर पर अपनी शर्तों, सम्मान और स्वाभिमान के साथ राज किया। एक ऐसे दौर में जब सत्ता का संघर्ष चरम पर था, मुगल, रोहिल्ले, जाट, मराठा, सिख, राजपूत, फ्रेंच शासक-सेनापति अपनी-अपनी सत्ता बचाने-बढ़ाने के लिए एक-दूसरे से आपस में संघर्षरत थे, साम्राज्यवादी ईस्ट इंडिया कंपनी सियासत की अपनी नई-नई चालों, कूटनीति और षडयंत्रों से आहिस्ता-आहिस्ता भारत के विशाल भू-भाग पर कब्जा करने में लगी हुई थी, ऐसे हंगामाखेज माहौल में बेगम समरू ने अपनी सूझबूझ और कुशल नेतृत्व क्षमता से सिर्फ अपनी रियासत को बचाए रखा, बल्कि उस रियासत में रहने वाली अवाम को भी खुशहाल बनाया।
जाहिद खान
  बेगम समरू की शख्सियत के प्रति सम्मान इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इस महिला ने जिसका वास्तविक नाम फरजाना था, उसकी तो कोई सम्मानजनक पृष्ठभूमि थी और ही वह किसी शाही घराने से वास्ता रखती थी, वह तो एक साधारण नृत्यांगना थी, जिसे किस्मत ने सरधना की बेगम बना दिया था। बहरहाल किस्मत ने फरजाना को जो मौका दिया था, उसने इस जिम्मेदारी को इस तरह से निभाया कि वह इतिहास में अमर हो गई। ऐसे बेमिसाल किरदार को जिसे इतिहास ने आसानी से बिसरा दिया है, जिसके बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां मशहूर हैं, उस किरदार का जिंदगीनामा लिखना, वाकई आसान काम नहीं। लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा की तारीफ की जाना चाहिए कि अट्हारवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर उनींसवीं सदी के साड़े तीन दशकों तक फैले बेगम समरू के लंबे जीवन और उत्तर भारत के पूरे सियासी घटनाक्रम पर उन्होंने तटस्थता और प्रामाणिक तथ्यों के साथ लिखा है।
इस पुस्तक की ख़ास बात यह है कि उनके लेखन में कहीं भी भटकाव नजर नहीं आता। इतिहास लेखन गंभीर अनुसंधान और तथ्यों के प्रति तटस्थता की मांग करता है, इन दोनों ही कसौटियों पर लेखक इस किताब में खरा उतरा है। इतिहास और आख्यान दोनों के मेल से राजगोपाल सिंह वर्मा ने बेगम समरू की शानदार जीवनी लिखी है। हालांकि, इस जीवनी में आख्यान कम और इतिहास ज्यादा है। बावजूद इसके २७० पन्नों से ज्यादा की यह किताब, अंत तक बांधे रखती है। अतीत के विस्तृत विवरण, इसे बोझिल नहीं बनाते।
राज गोपाल सिंह वर्मा 
   ऐसा नहीं कि बेगम समरू पर पहले नहीं लिखा गया, हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही जबानों में उनकी रोमांचक जिंदगी पर कई किताबें मसलनसात घूंघट वाला मुखड़ा’ (अमृतलाल नागर), ‘दिल पर एक दाग’ (उमाशंकर), ‘बेगम समरू ऑफ सरधना’ (माइकल नारन्युल), ‘समरू, फीयरलेस वारियर’ (जयपाल सिंह), ‘सरधाना की बेगम’ (रंगनाथ तिवारी), ‘आल दिस इज एंडेड : लाइफ एंड टाइम्स ऑफ बेगम समरू ऑफ सरधना’ (वेरा चटर्जी) आदि लिखी गई हैं। लेकिन यह सारी किताबें उनकी बेजोड़ शख्सियत से इंसाफ नहीं करतीं। ऐसे दौर में जब भारतीय समाज में महिलाओं को आजादी नाम मात्र की थी, यहां तक कि वे अपनी जिंदगी से जुड़े हुए फैसले भी खुद नहीं ले पाती थीं, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तौर पर ऐसे विषमतापूर्ण माहौल में बेगम समरू द्वारा अपनी पूरी जिंदगी एक जांबाज यौद्धा के तौर पर जीना, रियासत का नेतृत्व करते हुए एक साथ कई मोर्चों पर जूझना, सत्ता के अनेक केन्द्रों से संतुलन बनाए रखना, युद्ध की रणनीतियों को कुशलतापूर्वक अंजाम देना, मुस्लिम से कैथोलिक ईसाई बनना, जर्मन और फिर फ्रेंच सेनापति से विवाह संबंधों में बंधना, यह सारी बातें उनके किरदार को अनोखा बनाती हैं। एक ऐतिहासिक तथ्य और जिसे जानना बेहद जरूरी है, बेगम समरू ने अपनी जान पर खेलकर दो बार मुगल सम्राट शाहआलम की जान भी बचाई थी। बेगम समरू के इस बहादुरी भरे कारनामे की ही वजह से मुगल बादशाह ने उन्हेंजेब-उन-निसाकी उपाधि दी थी। बेगम समरू की जिंदगानी के बारे में ऐसे और भी जाने कितने दिलचस्प तथ्य और सच, ‘बेगम समरू का सचकिताब में बिखरे पड़े हैं।
लेखक ने कुछ इस तन्मयता से लिखा है कि किताब में बेगम समरू साकार हो गई हैं। वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने किताब की संक्षिप्त प्रस्तावना में बेगम समरू के अनछुए पहलुओं पर पर्याप्त रोशनी डालने के साथ-साथ, हिन्दी में क्यों अच्छे ऐतिहासिक उपन्यास, नहीं पाये ?, इस पर सारगर्भित टिप्पणी की है। उनका कहना है कि ‘‘हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास तो मिलते हैं, लेकिन इतिहास में साहित्य नहीं मिलता।’’ शंभूनाथ शुक्ल का दावा और सोच है किबेगम समरू का सचइस कमी को पूरा करता है। किताब पढ़कर, शायद बाकी लोग भी उनकी इस बात से इत्तेफाक रखेंगे। 
  -महल कॉलोनी, शिवपुरी (मप्र) , मोबाईल: 94254 89944

बेगम समरू का सच’ (जीवनी), लेखक : राजगोपाल सिंह वर्मापृष्ठ: 272, 
मूल्य :300, प्रकाशक : संवाद प्रकाशनमेरठ
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 पुस्तक समीक्षा 
सपनों के सच होने तक’ : मानवीय संवेदनाओं
 एवं सामाजिक सरोकारों का सशक्त दस्तवेज   
   राजकुमार जैन राजन का कविता संग्रह ‘सपनों के सच होने तक’ अयन प्रकाशन ,दिल्ली के माध्यम से साहित्य जगत में प्रवेश कर चुका है | फ्लैप पर वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र निर्मोही के स्नेहसिक्त सन्देशयुक्त इस कविता संग्रह में इक्यावन कवितायेँ है | कवर पेज भी आकर्षक है |  भाषा की प्रांजलता आरंभ से ही पाठक  को आकर्षित करती है | छंदमुक्त कविताओं के इस संग्रह में  कवि ने जीवन के हर पहलू को छूने का प्रयास किया है | भोगा हुआ यथार्थ, प्रेम ,समर्पण ,स्त्री-पुरुष सम्बन्ध ,आध्यात्म ,धर्म,मानवता,स्वार्थ,नारी,युवा,राष्ट्रीयता,आशा और निराशा जैसे विषयों पर भावो को शब्द देने का कवि ने प्रयास किया है  | नए –नए बिम्बों के माध्यम से कवि नदी की धारा की तरह कभी किनारों में मध्य बहता तो कभी तटों को तोड़ता हुआ कविताओं के गहन अवलोकन की आशा करता है | कवि संवेदनशील है और होना भी चाहिए | जैसा कि संग्रह का शीर्षक है ,कवि जीवन के कटु यथार्थ को जीता हुआ स्वप्न देखता और उनके साकार होना की कामना करता है |  ‘मानवता का पुनर्जन्म” कविता द्वारा आज के इस भौतिक युग में मरती हुई संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए कवि कहता है ...
"आत्मा के अँधेरे कोने में /चेतना की लौ /कभी धुंधली हो गई है /संवेदना ,अपने मृत हो जाने का /शंखनाद कर रही है" |इसी कविता में श्रम के महत्व को भी रेखांकित करता है यह कहकर ...
"फूल खिल जाता है /सूरज बन चमकता /पसीने का श्रृंगार बन / देह पर उभरता है" | इन पंक्तियों में एक नया बिम्ब उकेरा है ‘पसीने का श्रृंगार’|
कविता हमेशा हारे का हरिनाम होती है | जब निराशा के बादल घिरे हो तो कविता ही आशा का संचरण करती है | वह मनुष्य को हालात से लड़ने का साहस और औजार भी उपलब्ध कराती है | वह  तिनकों में एक बड़े लट्ठे की शक्ति उत्पन्न कर देती है और एक जुगनू भी अंधियार से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है ...संवेदनाओं की फसल की निम्नांकित पंक्तियाँ यही कह रही है .........".जगमगाते हुए जुगनुओं ने /अंधेरों के खिलाफ / लड़ाई छेड़ डी / और कई घर उजड़ने से बच गये"
मनुष्यता को बचाने की जंग मनुष्य के अस्तित्वकाल से हो रही है | साहित्यकार /कवि इस जंग में हमेशा योद्धा की भांति मोर्चे पर सबसे आगे दिखता है | राजकुमार जैन राजन इन पंक्तियों के माध्यम से जुगनुओं अर्थात आम आदमी से मानो स्वयं को बचाने के लिए ईर्ष्या, फिरकापरस्ती , राजनैतिक छल ,सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के विरुद्ध इस युद्ध में कूदने का अवाहन कर रहे हैं | यह बड़ी जंग है जिसमें हार से सम्पूर्ण मानव जाति के विद्ध्वंस का खतरा सन्निकट है | आज सत्य बोलना मानो अपने अस्तित्व को स्वयं चुनौती देना है | इस विचार को उनकी कविता ‘मेरे भीतर बहती है नदी’ की इन पंक्तियों से बल मिलता है जिसमें उनकी विवशता साफ़ झलकती है जब वे कहते है ...."अपने आप से जूझना /अपने विरुद्ध हो जाना / कितना मुश्किल है"
रामकिशोर उपाध्याय

यह विवशता मात्र उनकी नहीं है बल्कि यह उस पूरे वर्ग की है जो सत्य और न्याय का पोषक है और हर प्रकार के अत्याचार और अन्याय का विरोधी हैं | उनकी एक कविता है "आखिरी बार" . उसमें वह सामाजिक और आर्थिक विषमता का जिक्र में नये बिम्ब का प्रयोग करते हुए लिखते हैं...."तुमने अपने बदन को /कीमती सुंदर शाल से ढक रखा था / और मैं फटे कोट के साथ /अपने गंदे टोप से /गर्मी महसूसने की /नाकाम कोशिश कर रहा था "|
कुछ ऐसी ही बात एक अन्य कविता ‘नये युग की वसीयत’ में कहते हैं...किससे कहता अपनी व्यथा /फ़ैल रही इन विद्रूपताओं  और कर्जदारों के डर से /मैंने अपने आप को /मुर्दा घोषित कर दिया|"  कवि हर प्रकार के अतिवाद से बचता हुआ मध्य मार्ग को अपनाना चाहता है | यह उस व्यवस्था के प्रति छटपटाहट है जो धार्मिक बाह्य आडम्बरों से बोझिल है | और आडम्बर उसे उसके मानव होने के  अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हो तो  "समर्थन" कविता में कवि कुछ यूँ लिखकर अपनी पीड़ा व्यक्त करता है ..."जीवन के कुछ पल /अपने अस्तित्व बोध में /ऐसे भी होते हैं /जिनमें हम/ बुद्ध बन जाने को/  विवश होते हैं |" कवि जीवन के नये अर्थ तलाशता हुए कहता है कि ..."खुद से खुद की / लड़ाई लड़ते –लड़ते टूटने पर ही /नव सृजन होता है /वह सृष्टि का /अंतिम बिंदु होता है |" (पुनर्जन्म कविता ) |
 उनकी एक कविता है "जीवन और नदी" | यह बहुत ही प्यारी कविता है क्योंकि इसमें प्रवाहमन नदी और  मानव जीवन की निरंतरता एवं क्षणभंगुरता का उद्घोष है ..."इसके तटबंधो / अब कुंठा का अभिनय है /समुद्र में मिल जाने को /परायण की पीड़ा है /मिट जाने का गम है / और ..और /मैं सोचता हूँ /कितना साम्य है /जीवन और नदी में |" यह कविता कवि राजन के दार्शनिक चिंतन की अभिव्यक्ति है | नारी और नारी पीड़ा उनकी रचनाओं में मुखरता से अभिव्यक्त हुई है | "औरत" में कवि कहते है ..."जीवन के पिंजरे में /सामाजिक मानदंडों के /खोल चढ़ा / अभिशप्त परम्पराओं के /बन्धनों में छटपटा रही / मैं एक औरत हूँ |"   वह नारी के सम्मान से अधिक उसकी पुरुष से समानता के पक्षधर है और उसके जीवन में महत्व को रेखांकित  करते हुए कहते है ..."स्त्रीत्व के ऋण से /कभी पार न पा सकोगे /अन्यथा / हमारे होने का अर्थ ही मिट जायेगा / और सृष्टि चक्र /एक पल में रुक जायेगा |" भाग्य , सम्भावना ,समय ,अख़बार जैसे विषयों पर उनकी लेखनी से सशक्त रचनाओं का सृजन हुआ है | ‘इशारों को अगर समझो’ में कवि ने अंधाधुंध विकास पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए मनुष्य को इसके खतरों के प्रति सचेत किया है | नयी पीढ़ी’ में वर्तमान  युवा पीढ़ी की दयनीय स्थिति का चित्रण करते हुए कहते है ..."सुबह से शाम तक /यंत्रवत/ कम्यूटरों में दिए गये सिर/ जिंदगी की मृगमरीचिका में /  भटकते रहते है/ यश और धन की चाह में /आज के नवयुवक |"  इस साइबर युग ने युवा पीढ़ी के सामान्य जीवन को लील लिया है ,| उसका अपने स्वस्थ्य के  लिए सुबह का घूमना ,पत्नी .बच्चों और माता पिता के साथ उठना बैठना तक छिन गया है |
राजकुमार जैन राजन
 हर एक व्यक्ति की राजनैतिक विचारधारा होती है ,जाहिर सी बात है कवि की भी होगी | उनकी कई कविताओं में उनका राजनैतिक झुकाव स्पष्ट दिखाई देता है | असहिष्णुता , धार्मिक कट्टरपन और राजनैतिक /सामाजिक अस्पर्श्यता से बढ़ते तनाव के मध्य कवि राजकुमार जैन राजन वर्तमान से निराश नहीं है | वह जीवन के अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर खोज रहे  हैं अपने लिए भी और इस पूरी मानवता के कल्याण के लिए भी .... "खोजता हूँ / धर्मसभाओं में/ गुरुओं की ऐसी बाणी /जो दिशाहीन इस जीवन को/ नव विहान दे/ ऊँची हो गयी /स्वार्थ की दीवारों को /प्रेम की ऊष्मा देकर पिघला दे /पुलकित हो जाये मानव मन |" (खोज कविता )| वही सच्ची कविता होती है जो राह दिखाए भटके मनुज को और प्राणों में आशा का संचार करे | कवि इस कर्म में सफल होता दिखाई देता है ...जब वह कहता है ...
"अतीत की वादियों में /भटकता हुआ /मौसम बेअसर /और उग आये हो पंख पैरों में / उम्मीदों के शिशु थामे हुए /चलते जाना है /सपनों के सच होने तक |"  (सपनों के सच होने तक ) |
 कुल मिलाकर यह अच्छी कविताओं का इन्द्रधनुषी पठनीय संग्रह है | कवितायेँ अपने समय का कच्चा चिटठा होती है जिसमें कवि के द्वारा उसकी भावभूमि के अनुसार समसामयिक घटनाओं और विसंगतियों का कलात्मक चित्रण होता है | राजकुमार जैन राजन ने अपने समय की नब्ज़ टटोलने का इस संग्रह में सार्थक प्रयास किया है | उन्होंने मानवीय संवेदनाओं एवं सामजिक सरोकारों को बेहद नाजुक ढंग से समझते हुए अभिव्यक्त किया है | बहुत दिनों के बाद ऐसी कवितायें पढने को मिली है ,जिसके लिए कवि राजकुमार जैन राजन बधाई के पात्र है |
 समीक्षक ● रामकिशोर उपाध्याय
समीक्ष्य कृति : सपनों के सच होनें तक (कविता संग्रह),रचनाकार : राजकुमार जैन राजन , प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20- महरौली, नईदिल्ली - 110030,पृष्ठ : 130, मूल्य :260/- (सजिल्द)
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पुस्तक समीक्षा 
मानवीय मूल्यों, उच्च आदर्शों और राष्ट्रीयता का जीवंत दस्तावेज है- 'जीना इसी का नाम है'
'जीना इसी का नाम है' राजकुमार जैन राजन का सद्य: प्रकाशित आलेख-संग्रह है। जैसा कि लेखक ने स्पष्ट किया है कि ये आलेख पिछले 30 वर्षों के कालखंड में अलग-अलग समय और अवसरों पर विभिन्न पत्रिकाओं का संपादकीय दायित्व निभाते हुए लिखे गए हैं, वे पुस्तकाकार में आज हमारे सामने हैं। राजन बाल साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते हैं, लेकिन इस आलेख संग्रह को पढ़ने से उनका एक नया रूप हमारे समक्ष प्रकट होता है और वह है एक निबन्धकार का रूप, जो धीर है, गम्भीर है और समाज में घटित होने वाली घटनाओं के प्रति सजग भी है। राजन का दृष्टिकोण साफ एवं शीशे की तरह पारदर्शी है, उनकी सोच सकारात्मक है। अपने आत्मकथ्य में वे कहते हैं- ' जीवन की सुन्दरता इतनी सुन्दर वह आकर्षक नहीं है। सब कुछ हमारी आशाओं के अनुकूल नहीं होता। 'दिया तले अंधेरा' वाली कहावत हमारे जीवन में चरितार्थ होती है, तब जन्म लेती है लेखक की पीड़ा, दर्द, भावों में निराशा का प्रतिबिंब लिए वे शब्द जो अंधेरे में रोशनी बन दिल की गहराइयों को छू जाते हैं, जीवंतता के लिए आशा की किरण बन प्रस्फुटित होते हैं।'
इस पुस्तक में 29 आलेख हैं। 'पहले बर्तन का निर्माण करें' से शुरुआत करते हुए लेखक का कहना है- 'यह पूरी सृष्टि रचना का ही पर्याय है। यहां जो कुछ भी है मनुष्य से लेकर प्रकृति तक, वह एक विशिष्ट प्रयोजन से है। उसके होने में उसकी पूरी गरिमा और अर्थवत्ता निहित है।'
चांद, सूरज और बादल का दृष्टांत देते हुए उन्होंने यह संदेश दिया है कि हम दूसरों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हुए जियें। 'जीवन की समग्रता के बारे में सोचें' लेख में उन्होंने 'सुपर लर्निंग' की बात की है। उनके अनुसार इतनी शिक्षा के बावजूद आज समाज में हिंसा और अशांति बढ़ती ही जा रही है। सुपर लर्निंग मनुष्य की ऊर्जा का परिवर्तन कर उसे शक्तिशाली तो बना सकता है लेकिन उसे जीवन का आनंद नहीं दे सकता, अक्षरशः सत्य है। 
           'नारी ने विकास के नए आयामों को छुआ है' आलेख में उन्होंने नारी के विकास के लिए चार तत्त्वों को अहम बताया है- शिक्षा, दृढ़ इच्छाशक्ति, स्वावलम्बन और स्वतंत्रता। इसके साथ ही वे लिखते हैं कि, नारी का असली सौंदर्य शरीर नहीं, शील है। नारी अस्मिता के ख़तरे से नारी को स्वयं ही बचाना होगा। इसके साथ ही वे भारतीय नारी को पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण से बचने की और वैभवशाली  वैदिक युग के उत्तम आदर्शों को ग्रहण करने की सीख देते हैं। वर्तमान दौर में रिश्तों की संजीदगी, सम्बन्धों की भावनात्मक ऊर्जा शनै-शनै अपना स्वरुप खोती जा रही है, लेखक इससे चिंतित है और इसलिए वह कहता है- 'रिश्तों को डिस्पोजल होने से बचाएं।'
सरिता सुरणा

आज़ के भौतिकवादी युग में माता-पिता बालक को इंसान बनाने की जगह मशीन बनाने में लगे हुए हैं, उन्हें संस्कारित करने के बजाय डिजिटल बना रहे हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि संस्कारों का बीजारोपण सद्साहित्य से होता है न कि डिजिटल किताबों से। अगर राष्ट्र को सुदृढ़ बनाना है तो बच्चों को सबल बनाना होगा। वे ही हमारे भविष्य के कर्णधार हैं, कुछ इसी तरह के भाव पढ़ने को मिलते हैं- 'किताबें दिल और दिमाग को रोशनी देती है' आलेख में। 'व्यर्थ को दें अर्थ, बनेंगे समर्थ' लेख लेखक के अध्यात्मवादी चिंतन को पुष्ट करता प्रतीत होता है। इसमें वे व्यक्ति के चारित्रिक एवं नैतिक उत्थान की तथा मानवीय मूल्यों के प्रतिष्ठापन की बात करते हैं। इसका सार तत्त्व यही है- राष्ट्रहित सर्वोपरि है, पहले राष्ट्र फिर धर्म और मान्यताएं। कोशिश करने वालों की हार नहीं होती, व्यक्ति अपने जीवन का स्वयं वास्तुशिल्पी है, सफलता का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त होता है तथा आगे बढ़ने के लिए पुरुषार्थ होना चाहिए, जैसे लेख व्यक्ति को सफलता के पथ पर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। लेखक का मानना है कि बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर एवं परीक्षाएं देकर व्यक्ति डिग्रियां तो बटोर सकता है लेकिन पंडित नहीं बन सकता। पंडित वह होता है, जो प्रेम की भाषा बोलता है और यही विचार 'सत्य हमारी सभ्यता और संस्कृति का सार है', में लेखक ने व्यक्त किए हैं। हम जीवन की समग्रता के बारे में सोचें, सद्गुणों से जीवन को महकाएं, स्वयं का जीवन निर्माण करें जैसे लेखों में लेखक की चिंता यही है कि भौतिकवाद की चकाचौंध को पाने में ही मनुष्य की सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक क्षमता व्यय हो रही है और उसका भावनात्मक पक्ष नगण्य होता जा रहा है। 'जीवन में जितनी सादगी और संतोष होगा, उतना ही सुख होगा।' 
         
राज कुमार जैन 
 सद्साहित्य ही ज्ञान, विद्या, संस्कार और विवेक का लोक-मंगल पथ है। सद्साहित्य मनुष्यता का बोध जगाने, सद्गुण वह सदाचार से युक्त, स्वार्थ भेद से मुक्त जीवन जीने की राह दिखाता है। साहित्य के पठन-पाठन की परम्परा के क्षरण की वजह से ही नैतिक एवं चारित्रिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं। लेखक का मानना है कि हमें नई पीढ़ी में उन संस्कारों को पुनः रोपना है। वर्तमान समय राष्ट्र की विषम परीक्षा का चल रहा है। सांप्रदायिक शक्तियां स्थान-स्थान पर कुटिल विषधर की भांति राष्ट्र को डरा रही हैं। 'जियो और जीने दो' का मंत्र हमारे जीवन से विस्मृत होता जा रहा है। एक ओर गगनचुंबी अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी ओर घोर गरीबी और अभाव है। सामाजिक विषमता का उन्मूलन कर हर घर में ज्ञान, विवेक व संपन्नता का प्रकाश फैले, वही सच्ची दीपावली है। सारांशत: यही कहा जा सकता है कि लेखक ने जिस तरह सूत्र वाक्यों के जरिए अपनी बात को पाठकों के समक्ष रखा है, अगर उनमें से कुछेक को भी कोई अपने जीवन में उतारता है तो उसका जीना सार्थक हो सकता है और लेखक का लिखना भी। पुस्तक का कवर पृष्ठ जीवन-संघर्ष को दर्शाता हुआ प्रतीत हो रहा है, छपाई आकर्षक है। इस पुस्तक की खास बात यह है कि इसमें वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियां बहुत कम है। इस आदर्शोन्मुख लेखन में लेखक कहां तक सफल हुए हैं, यह तो पाठक ही तय करेंगे।

पुस्तक: जीना इसी का नाम है , लेखक: राजकुमार जैन राजन ,प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, 
नई दिल्ली- 110030 , संस्करण: 2020 ,मूल्य: 200/- (सजिल्द)
समीक्षक : सरिता सुराणा , वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका , हैदराबाद
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पुस्तक समीक्षा 
कोरोना वायरस पर आधारित कविताओं का अनुपम काव्यसंग्रह 
“कविता सच्ची भावनाओं का चित्र है, और सच्ची भावनाएँ चाहे सुख की हों या दु:ख की
उसी समय उत्पन्न होती हैं जब हम सुख या दु:ख का अनुभव करते हैं ।”       -मुंशी प्रेमचन्द 
एक वैश्विक महामारी जिसने सम्पूर्ण विश्व को देखते-देखते अपने आगोश में ले लिया । संसार की बड़ी-बड़ी महाशक्तियाँ भी इसके सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो गई।  ऐसे में कलमकारों की लेखनी अपने वश में रह नहीं पाई और उन्होंने अपने दिल की बात कलम द्वारा कागज पर उतार ही दिया । इन्हीं भावों से ओतप्रोत है यह साझा काव्य संकलन “कोरोना-विजय” । जिसमें सम्पूर्ण भारतवर्ष के मूर्धन्य विद्वानों के साथ-ही-साथ नवोदित कवियों एवं कवयित्रियों को भी स्थान दिया गया है । जिनकी लेखनी ने कोरोना (कोविड-19) पर, लॉकडाउन पर कुछ-न-कुछ लिखा है । वह चाहे छन्दबद्ध रचना हो या मुक्तछन्द सभी को इस काव्य संग्रह में यथोचित स्थान प्रदान किया गया है ।  
 डॉ.अरुण कुमार निषाद का नवीन साझा काव्य संग्रह नोशन प्रेस यूनाइटेड किंगडम से प्रकाशित हो गया । “कोरोना विजय” नामक इस काव्य संग्रह में संपूर्ण भारत के 31 कवियों-कवयित्रियों (प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय, मुकुल महान, युवराज भट्टराई,  डॉ.रामविनय सिंह, अरशद जमाल, प्रो.रवीन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. अलका सिंह, पंकज प्रसून, वाहिद अली वाहिद, डॉ.रीता त्रिवेदी, हरदीप सबरवाल, विनोद कुमार जैन, डॉ.प्रज्ञा पाण्डेय, डॉ.शैल वर्मा, महावीर उत्तरांचली,.हरिनारायण सिंह हरि, डॉ.अरुण कुमार निषाद, डॉ.रामहेत गौतम, अशोक कुमार श्रीवास्तव, प्रीती सिंह, प्रज्ञा दूबे, डॉ.आभा झा, अनीस शाह अनीस, डॉ.शालीन सिंह, कुशाग्र जैन, डॉ.एस.एन. झा, डॉ.पूजा झा,रामकिशन शर्मा, सिन्धु मिश्रा,डॉ.प्रवेश सक्सेना, परमानन्द भट्ट की कविताओं को इसमें शालीन किया गया है जिन्होंने कोरोना वायरस, लाक डाउन पर कविता, गजल, दोहे, मुक्तक आदि लिखे हैं । यह पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।
कवि हरिनारायण सिंह हरि लोगों अपनी कविता माध्यम संदेश देते हैं कि इस आपसी मनमुटाव को हम बाद में सुलझा लेंगे । पहले हमें कोरोना जैसी महामारी से बचना है ।
यह कोरोना का रोना छोड़ो, डट जाओ,
डॉ.अरुण कुमार निषाद
इससे लड़ना है मित्र! आज झटपट आओ ।
आपसी मनोमालिन्य, बोध कर लेंगे हम ।
रे अभी साथ दो,फिर विरोध कर लेंगे हम ।
सुल्तानपुर के प्रसिद्ध शायर अरशद जमाल कहते हैं कि आदमी को इस लाकडाउन में तन्हा महसूस नहीं करना चाहिए । उस समय का सदुपयोग करना चाहिए । अच्छे-अच्छे साहित्य पढ़ना चाहिए । कोई मन पसन्द कार्य करना चाहिए ।
कहां हूं तनहा मैं
ये किताबें
ये 'होरी ' ये 'धनिया'
अभी लिपट पड़ेंगे मुझसे
गांव की सोंधी महक के साथ
डी.ए.वी. कालेज देहरादून के संस्कृत प्रोफेसर और कवि डॉ.राम विनय लिखते हैं ।
मोहब्बत को बहुत मज़बूर करने आ गयी है,
हिदायत को यहाँ मशहूर करने आ गयी है,
बड़ी ही बदगुमां है, बदनज़र है, बदबला भी
कॅरोना दिल को दिल से दूर करने आ गयी है।
प्रो.ताराशंकरशर्मापाण्डेयआचार्य साहित्य विभाग, पूर्व विभागाध्यक्ष, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर, राजस्थान ।) लिखते हैं-  
रात चाँदनी महफ़िल सजी
सम्मिलित हुए  कई देश
छूटे कुछ, बुलाये आ गये
देखो नये अतिथि विशेष
दिल्ली के युवा कवि  युवराज भट्टराई (साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार विजेता) लिखते हैं-
महान आपत्ति प्रचण्ड है अभी,
त्रिलोक में ये लगती भयावनी।
अजीब-सी व्याधि प्रवर्धमान है,
अतः रहो रे गृह में प्रजा सभी।। 
लखनऊ के मशहूर कवि मुकुल महान शहरों से गाँवों की तरफ पलायन करने वाले मजदूरों की पीड़ा को कुछ इस तरह व्यक्त किया है ।
 अपनी जीवन डोर थाम कर ,
होकर के मजबूर चल पड़े ।
शहरों की आपाधापी में ,
गाँवों को मजदूर चल पड़े ।।
एक अन्य ग़ज़ल में मुकुल जी कहते हैं-
 बेशक थोड़ा डर में रहिए ,
लेकिन अपने घर में रहिए ।
आसमान में उड़ने  वालों ,
अपनी ज़द और पर में रहिए ।
प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह (प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ ) अपनी कविता में लिखते हैं कि बहुत दिन नहीं है । हम जल्दी ही इस महामारी से उबर जायेंगे । बस सभी मनुष्यों को थोड़े से धैर्य की जरुरत है ।
जीत रहा भारत ये विपदा ,
बस थोड़ी सी और कसर है ।
थोड़ी दृढ़ता और चाहिये,
डॉ. अलका सिंह, ( असिस्टेंट प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ) कोरोना के लिए दैत्य शब्द प्रयोग करती हैं । वे लिखती हैं कि- हम सभी को कुछ दिन अपने-अपने घरों में रहने की जरुरत है । यह दैत्य कोरोना अवश्य ही हारेगा ।
क्वारंटाइन शब्द नहीं ,
संयम का पर्याय कह लीजिये ।
इस महादैत्य से लड़ने में ,
ऊर्जा का संचार कह लीजिये ।
एकांतवास अपनी संस्कृति है,
संघर्ष हेतु मन की  स्थिति है ।
डॉ.अरुण कुमार निषाद असिस्टेण्ट प्रोफेसर(संस्कृतविभाग, मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय,कटकाखानपुर, द्वारिकागंज,सुल्तानपुर) अपने तांका छन्द में लिखी कविता के माध्यम से कहते हैं-
1.तुमसे अब
परेशान हो गयी
दुनिया सारी
रे! राक्षस कोरोना ।
सुन रहा है न तू ।
2.महाशक्तियाँ
कोरोना के कारण
चुपचाप हैं
नि:शब्द हो गयी हैं
समस्त जगत की ।
डॉ.एस.एन झा (एसो.प्रोफेसर के. एस. आर. कालेज , सरौरंजन, समस्तीपुर, एल.एम.एन.यू. दरभंगा, बिहार) लिखते हैं कि- साफ सफाई अपनाइए कोरोना अपने आप आपसे दूर भगेगा ।
यह, कट्टर, क्रूर कोरोना,
कुकर्मी   संग   रहता   है,
निर्मल,निश्छल,निर्भीक,निडर,
के  पास  जाने  से  डरता  है । 
विनोद कुमार जैन वाग्वर सागवाड़ा  से लिखते हैं कि- जो जहाँ है वहीं कुछ दिन और रुक जाए । कोरोना एक छुआछूत की बीमारी है जो लोगों के सम्पर्क में आने से हो रही है ।
 पाँव पसार रहा कोरोना ठहर जाओ ,
जहाँ है वही रहे , का बजर बजाओ ,
फिरोजाबाद की संस्कृत प्रोफेसर डॉ.शैल वर्मा लिखती हैं कि आज दसों दिशाओं में कोरोना ही कोरोना सुनाई दे रहा है । सभी धैर्य पूर्वक इसका सामना करना है ।
भूमंडल पर विपदा छायी,
महामारी कोरोना  आयी।
राजस्थान के कवि परमानंद भट्ट लिख्ते हैं-
डर जायेगा बाहर मत जा
घबराऐगा बाहर मत जा
दिल्ली की संस्कृत प्रोफेसर डॉ. प्रवेश सक्सेना लिखती हैं-
दूत काल- सा आ गया,'कोरोना' का रोग
पूरा जगत् चपेट में,जनजन को है सोग।।
दिल्ली के कवि रामकिशन शर्मा लाक डाउन के बारे में सबको समझाते हुए कहते हैं-
इक्कीस दिन के लॉक-डाउन को सफल यूँ बनाना है
घरों में रह कर अपने,'कोरोना' को हर हाल हराना है |

इस प्रकार हम देखते हैं किसी कवि ने इस संकट की घड़ी में दूरी बनाने की सलाह दी है, किसी ने घर में रहने की सलाह दी है, किसी ने सरकार के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी है । तो किसी-किसी ने मजबूर लोगों के लिए अपनी शोक संवेदना व्यक्त की है । 
डॉ.अरुण कुमार निषाद, असिस्टेण्ट प्रोफेसर (संस्कृत विभाग),मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय,,कटकाखानपुर, द्वारिकागंज,सुल्तानपुर |,Mo-9454067032, 8318975118 , Email-arun.ugc@gmail.com


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पुस्तक समीक्षा 
हार्ड होती जिंदगी में कुछ साफ्ट ढ़ूढने की कोशिश   
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राम नगीना मौर्य 
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iqLrd &^lkWQ~V dkuZj^   ys[kd & Jh jke uxhuk ekS;Z] रश्मि प्रकाशन लखनऊ 
समीक्षक : डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी 2&a,] mRrjiYyh] lksniqj] dksydkrk&700110] Ekks&09433675671
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पुस्तक समीक्षा 
तेलुगु भाषा और साहित्य की समग्र झाँकी
प्रख्यात जर्मन दार्शनिक हेगेल (जिन्हें हिंदी वाले प्यार से हीगल कहते हैं) कहा करते थे कि पुस्तक की भूमिका स्वरूप लिखे गए उनके वक्तव्य को गंभीरता से न लिया जाए क्योंकि मुख्य है उनकी कृति। लेकिन उनके विपरीत फ्रेंच दार्शनिक जाक देरिदा ने कहा कि भूमिका-लेखन कृति के पाठ के पश्चात तैयार किया गया वक्तव्य है जो कृति से पहले पढ़ा जाता है। उन्होंने भूमिका-लेखन से परहेज किया और माना कि प्रस्तुत कृति उनकी अगली कृति की भूमिका है और उनका समस्त लेखन भूमिकाओं की एक अखंड शृंखला।  गुर्रमकोंडा नीरजा की इस कृति ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ के प्रथम पाठ से ये दो विचारक और उनके विचार अनायास  सामने आते हैं।
इस कृति में लेखिका द्वारा दी गई कोई भूमिका नहीं है किंतु समस्त टेक्स्ट उस भूमिका का साधिकार और समर्थ निर्वाह है। भूमिका स्वरूप चार विद्वानों - प्रो.राज मणि शर्मा, प्रो. देवराज, प्रो. योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ और प्रो. एम. वेंकटेश्वर -  के अभिमत और पाठ हैं जिनसे एक और पाठकीय पाठ तैयार हो सकता है। प्रो. ऋषभदेव शर्मा की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर उन्हें यह कृति सादर भेंट की गई है। लेखिका ने इस दशक में ही  दर्जन भर ग्रंथों का लेखन, संपादन और अनुवाद करके अपनी प्रांजल प्रतिभा से अमित पहचान बनाई है। इतने ही पुरस्कार प्राप्त करके यश भी कमाया है। हिंदी और तेलुगु भाषियों के बीच की अपरिचय की गोल-गाँठ को ढीला किया है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय से प्राप्त वित्तीय अनुदान से (प्रकाशित और निदेशालय के ‘हिंदीतर भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार द्वारा पुरस्कृत भी) इस पुस्तक में हिंदी भाषा के माध्यम से दक्षिण भारत की एक महत्वपूर्ण भाषा के साहित्य और साहित्यकारों से परिचय तो प्राप्त होता ही है, कई रचनाकारों के प्रति जिज्ञासा, भक्ति और प्रेम भी उत्पन्न हो जाता है। यह इस रचना का प्रभाव है।
प्रो.गोपाल शर्मा
सात खंडों में निबद्ध इस टेक्स्ट में पहला खंड तेलुगु भाषा और साहित्य का प्रामाणिक परिचय देता है और अंतिम खंड इस भाषा के प्रमुख रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करता है। इन दोनों खंडों के बीच तेलुगु साहित्य का मानो समस्त संसार ही हस्तामलकवत प्रस्तुत है। हिंदी के आम पाठक को इस कृति के पाठ से अहसासे कमतरी (inferioirty complex) होगा जैसा  मुझे भी हुआ। कितना कम जानते हैं हम अपने ही देश के रचनाकारों को! महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बहुत साल पहले इंग्लिश और संस्कृत से ही नहीं, भारत की अन्यान्य भाषाओं से ‘ज्ञान रत्न’ लेने की अनुशंसा की थी। तुलनात्मक अध्ययन तथा अनुवाद के माध्यम से बहुत कुछ सुलभ है भी। हमें इस प्रकार के ग्रंथों से बहुत कुछ एक स्थान पर मिल जाता है। इसलिए इस कृति का दोगुना महत्व है। शोधरथी और शोधार्थी दोनों को इसमें अनेक शोधकार्यों की प्रेरणा मिलेगी। तुलनात्मक अध्ययन और साहित्य के अनुवाद में लगे विद्वानों का मन इसमें रमेगा। आम पाठक को तेलुगु साहित्य, भाषा और भाषाविज्ञान का सहज बोध होगा।
निश्चय ही इस पुस्तक के लेखन में एक दशक लगा होगा। तेलुगु गद्य–पद्य का अनुवाद प्रस्तुत करना, समुचित संदर्भ देकर अपनी बात को प्रमाण सहित प्रस्तुत करना, रचनाओं और रचनाकारों के वैविध्य को रेखांकित करते हुए चलना, साहित्य के विभिन्न आंदोलनों और विमर्शों को स्थापित करना लेखिका का साध्य रहा है। साधन रहा है तेलुगु भाषा के माध्यम से किया गया सृजनात्मक लेखन - विपुल लेखन। पता चलता है कि  तेलुगु साहित्य और संवेदना का विकास भी उसी प्रकार हुआ है जैसे हिंदी और भारत की अन्य भाषाओं का।  यह जानकर उत्साहित पाठक इस पुस्तक को कई बार पढ़ता है। जैसे दूध का भरा कटोरा और उसके ऊपर सरस मलाई, वैसा है – खंड एक । और दूध के घूँट जैसे अन्य आलेख – किसी को भी गटको; कंठ तर होगा। मैं  ‘न. गोपि’ के खंड को कई बार पढ़कर सोचने लगा था – यह अलग से ही एक पुस्तक हो सकती थी। कई प्रकरण पुस्तकों की रूपरेखाओं से कम नहीं।
कई विद्वान दूसरों की रचनाएँ नहीं पढ़ते और इसे वे गर्व से स्वीकार भी करते हैं। उत्तर आधुनिक काल में यह दंभ नहीं, मूर्खता है। यदि आप इस कृति का एक से अधिक बार पारायण करते हैं तो कम से कम एक दर्जन पुस्तकों के लिए आधार वक्तव्य मिल जाएगा और इतने ही शोध के उपयुक्त विषय भी। अनेक सूक्तियाँ मिलेंगी जो आपको किसी ‘सेल्फ-हेल्प’ बुक में भी न मिल सकेंगी। एक उदाहरण देता हूँ – पत्नी की बातों में आकर भाई-भाई लड़कर / एक दूसरे से जुदा होने वाले मूर्ख हैं / कुत्ते की पूँछ को पकड़कर गोदावरी को पार करना क्या संभव है?/ विश्वदाभिराम सुन रे वेमा)। आप यहाँ उन रचनाकारों को भी हिंदी में पढ़ सकते हैं जिनकी कृति को पढ़ना ‘शैतानिक वर्सिज’ पढ़ने जैसा तलवार की धार पर दौड़ना है। वरवर राव की कविता हो या अली की बेबसी ( – मेरा नाम अली जानकर / रद्दी कागज के समान / फेंक दिया करते हैं –) सब यहाँ हैं।
एक साथ सैकड़ो रचनाकार। पर यह इतिहास नहीं। समीक्षा या आलोचना भी नहीं। टेक्स्ट है, पाठ है, अनुवाद है, विश्लेषण और विवेचन है। एक यात्रा है जिसे आपका ‘अंतरगत’ अवश्य सराहेगा। और हाँ, खरीदकर पढ़ने योग्य – मूल्य लागत मात्र। पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी।
समीक्षित पुस्तक : तेलुगू साहित्य : एक अंतर्यात्रा/, लेखिका :गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2016/ प्रकाशक/ वितरक : श्रीसाहिती प्रकाशन, 304 मेधा टावर्स, राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर रिंगरोड, हैदराबाद (9849986346)/ 231 पृष्ठ/ मूल्य : 80 रु
समीक्षक : प्रो.गोपाल शर्मा ,प्रोफेसर, अरबा मिंच विश्वविद्यालय,,अरबा मिंच, इथियोपिया  profgopalsharma@gmail.com

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस वैश्विक महामारी में भी आप ने हम साहित्य प्रेमियों के लिए पाठ्य सामग्री उपलब्ध करवाई इसके लिए आपके अखिल संपादक मंडल को साधुवाद। सादर प्रणाम

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    1. निषाद जी, आप की बहुमूल्य टिप्पणी के लिए आप का आभार । बस एक दो दिनों में'कहानियाँ' स्तम्भ में आप देश-विदेश के प्रतिष्ठित कथाकारों की कहानियों का भी आनंद उठा सकेंगे।

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  2. कोरोना संकट के इस संक्रमण काल में आपका यह प्रयास प्रशंसनीय है। बहुत-बहुत साधुवाद।

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    1. जी आप का आभार । बस एक दो दिनों में'कहानियाँ' स्तम्भ में आप देश-विदेश के प्रतिष्ठित कथाकारों की कहानियों का भी आनंद उठा सकेंगी ।

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  3. आपने हमारे कविता संग्रह "सपनों के सच होने तक " एवम आलेख संग्रह " जीना इसी का नाम है" पर वरिष्ठ रचनाकारों की समीक्षाएं प्रकाशित कर मुझे ऊर्जा, प्रेरणा, सम्बल प्रदान किया इसके लिए सम्पूर्ण "प्रणाम पर्यटन" टीम सहित समीक्षकों का हृदय से आभरी हु।धन्यवाद
    ●राजकुमार जैन राजन, आकोला ,राजस्थान

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    1. राजन भाई ,आप जैसे साहित्यनुरागियों की वजह से साहित्य का आकाश जगमग कर रहा है । आप का आभार । बस एक दो दिनों में'कहानियाँ' स्तम्भ में आप देश-विदेश के प्रतिष्ठित कथाकारों की कहानियों का भी आनंद उठा सकेंगे।

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  4. आप का बहुत बहुत आभार । बस एक दो दिनों में'कहानियाँ' स्तम्भ में आप देश-विदेश के प्रतिष्ठित कथाकारों की कहानियों का भी आनंद उठा सकेंगे।

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